अमर उजाला ब्यूरो
जींद।
बेशक आज भी लोग बेटियों को बोझ समझते हैं, लेकिन धनौरी गांव निवासी रामनिवास ने 25 साल पहले भी बेटियों को बोझ नहीं समझा। उनकी प्रेरणा और सहयोग से आज उनकी बेटी गुरमेल कौर देश भर में जानी जा रही हैं और अर्जुन अवार्ड हासिल कर चुकी हैं। हालांकि व्यवस्थाओं के आगे हार मान एक बार खेल ही छोड़ने का फैसला किया था, लेकिन पिता की प्रेरणा ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडलिस्ट बना दिया।
हैंडबाल खिलाड़ी और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित गुरमेल कौर के अनुसार उनके पिता ने साधारण किसान होते हुए भी बेटियों के लिए हमेशा अच्छी सोच रखी। गुरमेल कौर की तीन और बहन हैं। गुरमेल के अनुसार उस समय में हर कोई यही सोचता था कि लड़कियों पर इतना खर्च नहीं करना चाहिए, लेकिन उनके पिता ने फिर भी सिरसा के शाह सतनाम जैसे महंगे स्कूल में पढ़ाई करवाई। इतना ही नहीं ग्रामीण परिवेश से होने के कारण उनके टूर्नामेंट में भी उनके पिता साथ जाते थे। दूसरे राज्यों में होने वाली प्रतियोगिताओं के लिए दिल्ली तक छोड़कर आते और वापसी में साथ लाते। खेती के साथ-साथ उन्होंने पूरा समय दिया।
तब पिता ने दिया हौसला
गुरमेल ने बताया कि 2008 में कैंप के बाद उनका चयन भारतीय महिला हैंडबाल टीम के लिए नहीं हुआ। इस पर वे भिलाई से रोती हुई अंबाला रेलवे स्टेशन पर पहुंची। वहां उनके पिता ने काफी हौसला दिया और आगे के खेल के लिए प्रेरित किया। गुरमेल के अनुसार तब उन्होंने खेल छोड़ने का ही फैसला कर लिया था, लेकिन पिता की प्रेरणा से खेल जारी रखा और अब अर्जुन अवार्ड मिल गया है।
पिता बोले, मैं तो बेटी के नाम से ही जाना जाता हूं
वहीं गुरमेल के पिता ने अमर उजाला को बताया कि उन्होंने हमेशा एक पिता होने का फर्ज अदा किया। हर मां-बाप ऐसा करते हैं। बेटी के शानदार खेल के कारण आज लोग उन्हें गुरमेल कौर के पिता के रूप में जानते हैं।
पिता के हौसले ने बनाया अंतरराष्ट्रीय गोल्ड मेडलिस्ट, दिलाया भीम अवार्ड
हैंडबाल खिलाड़ी गुरमेल कौर जब व्यवस्थाओं से हारीं तो पिता ने बताया चैंपियन