फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जो लौट के घर न आए मेडिकल रेस्ट के बावजूद, चिकित्सा सलाह को दरकिनार कर मोर्चे पर पहुंचा साथी की राइफल नहीं चली तो उसे हटा खुद

विज्ञापन
विज्ञापन
मेडिकल रेस्ट के बावजूद मोर्चे पर पहुंचा साथी की राइफल नहीं चली तो उसे हटा खुद किया दुश्मन का सामना
विज्ञापन

धर्मवीर निडाना
जींद। 21 फरवरी 2016 को पंपोर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए जींद के वीर सपूत कैप्टन पवन कुमार अदम्य साहस और बहादुरी के मिसाल हैं। देश की रक्षा करते हुए प्राणों का बलिदान देने वाले पवन कुमार को आज भी देश याद कर रहा है। पवन कुमार ने मेडिकल रेस्ट पर होते हुए पंपोर में आतंकवादियों से लोहा लेने में खुद को ऑपरेशन में लगा दिया। शहीद पवन कुमार बहादुरी की मिसाल थे। 10 पैरा में उनकी नियुक्ति महज पांच माह रही। इसी समय उन्होंने अपने प्राण देश के लिए लगा दिए।
शहीद कैप्टन पवन कुमार के पिता राजबीर सिंह के अनुसार 14 दिसंबर 2013 को सेना में कमीशन मिलने के बाद पवन कुमार की नियुक्ति 7 डोगरा रेजिमेंट में हुई, लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं था। उनको सेना की सबसे विशेष रेजिमेंट में जाने की कसक थी। यही कसक पवन को 10 पैरा में ले गई। राजबीर सिंह के अनुसार 28 फरवरी 2015 में भारतीय सेना की 10 पैरा रेजिमेंट की ट्रेनिंग लेने के बाद जब पवन घर लौटे तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। 10 पैरा में जाने के बाद 20 सितंबर 2015 को पवन को जम्मू-कश्मीर में तैनात कर दिया गया। जनवरी में छुट्टी पर आने के बाद 17 जनवरी को वापस ड्यूटी पर लौटे तो उन्हें एक ऑपरेशन में शामिल होना पड़ा। वहां पत्थरबाजों का निशाना बन गए। इसमें उन्हें काफी चोट आई और पत्थर लगने से उनके चार दांत भी टूट गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहां से छह फरवरी को छुट्टी मिल गई, लेकिन डॉक्टरों न 21 फरवरी तक उन्हें रेस्ट करने का सुझाव दिया। रेस्ट के दौरान ही 20 फरवरी को पंपोर में सेना को आतंकवादियों की हलचल का पता चला। इस पर ऑपरेशन रक्षक शुरू किया गया। छुट्टी पर होने बाद भी पवन ने ऑपरेशन में शामिल होने की इच्छा जताई। साथियों ने मना भी किया, लेकिन वे नहीं माने। 20 फरवरी को रात साढ़े आठ बजे ऑपरेशन शुरू हुआ तो पवन भी निकल गए। उनकी गाड़ी रास्ते में एक नाले में फंस गई। साथियों ने कहा कि भगवान भी नहीं चाहते कि वे ऑपरेशन में शामिल हों, लेकिन उन्होंने खुद पानी में उतर कर गाड़ी को धक्का देकर बाहर निकाला। भीगे कपड़ों में वह एक इमारत में छुपे तीन आतंकवादियों से मोर्चा लेने के लिए पहुंच गए। आतंकवादियों से मोर्चा लेते समय उनके आगे चल रहे सैनिक की राइफल काम करना छोड़ गई। मौके की नजाकत को समझते हुए कैप्टन पवन कुमार ने अपने साथी को धक्का देकर गिरा दिया और खुद आगे बढ़ गए। उन्होंने एक आतंकवादी को मार गिराया, लेकिन दरवाजे के पीछे छिपे आतंकवादी ने उनको निशाना बनाया और वे अदम्य साहस का परिचय देते हुए शहीद हो गए। भारत सरकार ने उनकी शहादत पर उन्हें शौर्यचक्र से नवाजा था।
विज्ञापन

दिलों में बसते हैं पवन
राजबीर सिंह के अनुसार पवन शहीद होकर बेशक हमारे बीच नहीं है, लेकिन आज भी वे देश के लोगों के दिलों में बसते हैं। यही उनकी कमाई है। आज भी युवा उनसे प्रेरणा ले रहे हैं। युवाओं को चाहिए के वे किसी न किसी तरीके से देश के लिए काम करें।
विज्ञापन

आंतरिक दुश्मनों की कमर तोड़े सरकार
हमारे सैनिक बाहरी दुश्मनों से कभी नहीं हारते, लेकिन आंतरिक दुश्मन काफी हैं। विशेषकर पत्थरबाज। इससे काफी नुकसान होता है। जो लोग देश से गद्दारी कर रहे हैं, उनकी सुरक्षा व सुविधाएं वापस लेकर सरकार ने अच्छा काम किया है। साथ ही सेना को खुली छूट देकर मनोबल को बढ़ाया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें