जातिवाद और क्षेत्रवाद से दूर रहने वाला हलका इस बार भी अपने पराये के साथ-साथ विकास कार्यों को देखते हुए वोट देने की ठान रहा है। आमतौर पर हमेशा जातिवाद को दरकिनार करते हुए ही मतदाताओं ने वोट का प्रयोग किया है। प्रतिनिधि के चुनाव में अपने-पराये का पूरा ध्यान रखा जाता। हलके की जनता ने जिस भी नेता को सिर आंखों पर बैठाया तो उसका पूरा मान सम्मान किया जबकि जिस नेता को नकार दिया उसे कभी गले लगाने का प्रयास भी नहीं किया। ऐसे में सभी सर्वे रिपोर्ट भी फेल हो जाती है। बादली से कांग्रेस की लहर में कांग्रेस उम्मीदवार हार चुका है जबकि मोदी लहर में लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार अरविंद शर्मा को बादली हलके से पिछड़ना पड़ा था।
बादली की जनता ने जातिवाद से ऊपर उठते हुए चौधरी धीरपाल सिंह को 5 बार लगातार विधायक बनाया। जबकि हरियाणा विधानसभा में डिप्टी स्पीकर रह चुके चौधरी मनफूल सिंह को बादली हलके से हर बार करारी हार का सामना करना पड़ा है। बादली के चौधरियों के लिए पगड़ी को लेकर दिए गए बयान पर मनफूल सिंह से लोगों की नाराजगी इस कदर बनी कि पहले उन्हें विधानसभा चुनाव में सफल नहीं होने दिया और बाद में उनके लड़के बिजेन्द्र चाहार को भी विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। नरेश शर्मा पर हलके की जनता जब मेहरबान हुई तो निर्दलीय जीताकर विधानसभा में भेज दिया लेकिन जब नाराजगी जाहिर की तो कांग्रेस की टिकट पर जमानत भी जब्त करा दी, जिसकी नाराजगी वर्तमान समय में भी नरेश को झेलनी पड़ रही है। इसी वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी चली लेकिन बादली की जनता ने भाजपा उम्मीदवार अरविंद शर्मा को करीब साढ़े 12 हजार वोटों से पिछाड़कर भाजपा के मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ को आईना दिखा दिया। इसी प्रकार से हुड्डा लहर में चत्तर सिंह पहलवान विधानसभा नहीं पहुंच सके। ऐसे में कयास लगाए जा रहे है कि बादली की जनता अपने और पराये की पहचान के बाद ही वोट का प्रयोग करती है, जिसके सामने सभी समीकरण विफल हो जाते हैं।