पंचायत चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वीरवार को ग्रामीण क्षेत्र में फिर हलचल शुरू हो गई। प्रशासन को जहां पूर्व में की गई तैयारियों की नए सिरे से समीक्षा करनी होगी, वहीं अपनी चुनावी जमीन खिसकती देख कई चौधर के लिए नई जुगत में लग गए हैं।
जो उम्मीदवार योग्य थे और सुप्रीम कोर्ट में केस जाने के बाद चुनाव प्रचार से पीछे हट गए थे, उनको भी अब पिछले दो माह में समीकरण बिगड़ने का डर सता रहा है।
माना जा रहा है कि अब चुनाव को लेकर नामांकन प्रक्रिया नए सिरे से होगा। इसमें खर्च के साथ परेशानी भी बढ़ने वाली है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले बाद जिले की कुल आबादी में से करीब 43 प्रतिशत लोगों की चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
झज्जर जिले में पंचायत चुनाव के प्रथम चरण के लिए जिला परिषद के अलावा झज्जर और बहादुरगढ़ खंड में ग्राम पंचायत व पंचायत समिति के लिए नामांकन की प्रक्रिया 19 सितंबर को निपटी थी। अन्य खंडों के लिए चुनाव दूूसरे व तीसरे चरण में प्रस्तावित थे। अकेले जिला परिषद के 19 वार्डों की बात करें तो इसमें कुल 195 ने नामांकन जमा कराया था। इनमें 78 महिलाएं थीं।
झज्जर जिले में 250 ग्राम पंचायतों के लिए 1078 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इनमें झज्जर खंड के लिए 224 व बहादुरगढ़ के लिए 410 केंद्रों में प्रथम चारण में वोट पड़ने थे। चुनाव में सरकार की शर्तों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाने के बाद अब हालात बदल गए हैं।
चुनावी शोर जहां ठंडा पड़ चुका है, वहीं प्रशासन की तैयारियों को जंग सा लग गया है। चुनाव मैदान में कूदने वाले प्रत्याशियों को जहां नए सिरे से वोट के लिए लॉबिंग करनी होगी, वहीं प्रशासन को भी अपनेे तैयारियों को धार देनी पड़ेगी। झज्जर के आधे से अधिक मतदान केंद्रों को संवेदनशील माना जा रहा था।
खेड़ी खुमार : ताश की बाजी के साथ चुनावी चर्चा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद ही ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत चुनाव पर चर्चा शुरू हो गई। शहर के नजदीकी गांव खेड़ी खुमार में बुजुर्गों की टोली भले ही ताश खेलकर टाइम पास में लगी हो, लेकिन मुद्दा चुनावी चर्चा ही था।
हुक्के की गुड़गड़ाहट व ताश की बाजी के बीच बुजुर्गों ने यह कहने से परहेज नहीं किया कि कोर्ट ने तो कई चौधरियों की रड़क काढ़ दी है।
युवाओं और पढ़ी-लिखी महिलाएं हालांकि खुश दिखे कि अब चौधर उनकी होगी। अंगूठा छाप के यहां चक्कर नहीं काटने होंगे। ग्रामीण बोले कि एक बार फिर चौधराहट की जंग लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले बाद करीब 43 प्रतिशत लोगों की चुनाव लड़ने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।
अदालत का फैसला बिल्कुल सही है। सरपंच और अन्य पंचायत प्रतिनिधि शिक्षित होंगे तो अपने फैसले खुद करेंगे। पहले जो भी महिलाएं सरपंच बनीं, वे रबड़ की स्टैंप से ज्यादा कुछ नहीं थीं। अब गांवों में हालात अच्छे होंगे।
कृष्ण कुमार
सरकार ने नई शर्तें थोपकर गांव में पंचायत चुनाव का माहौल बिगड़ दिया है। अब क्या रखा है चुनाव में। सरकार इब तो पहले वालों ने अगले पांच साल तक सरपंच बना रहण दै। नए उम्मीदवारों की रड़क तो इन दो महीनों में ही निकलगी है। प्यारे लाल
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हम सरपंच के पढ़े-लिखे होने के पक्ष में हैं। कोई शिक्षित व्यक्ति ही अपने गांव व देश के विकास की चिंता कर सकै सैै। अनपढ़ तो पूरे पांच साल दूसरों के भरोसे रहा। अब तो बस एमएलए व सांसद के लिए भी इस प्रकार की योग्यता लागू करने की जरूरत है।
दीवान, पूर्व सरपंच (फोटो-18)
सरकार का फैसला पूरी तरह से गलत है। उन बेचारों ने क्या कसूर किया, जिससे कि वे पुराने हालातों में पढ़ नहीं सके और अब सरपंची भी उनके हाथ में नहीं। अंग्रेजी राज की व्यवस्था लागू करने का प्रयास हो रहा है। आने वालों में तो इनसे वोट का अधिकार भी छीना जा सकता है।
रामचंद्र जांगड़ा
सरकार ने जो व्यवस्थाएं गांव में व्यवस्था सुधार के लिए लागू की, उनका स्वागत है। गांव विकास को लेकर सरकार की सोच बेहतर है। अब ग्रामीणों को भी इसमें साथ देना चाहिए। एक शिक्षित व्यक्ति ही समाज सुधार का सपना देख सकता है। सुमन, पूर्व सदस्य ब्लॉक समिति
जो भी फैसला आया, वो अच्छा है। हमारे बुजुर्गों को भी अब पढ़ाई की अहमियत समझ में आ गई है। पहले तो लड़कियों को पढ़ाने में भी ग्रामीणों को परहेज था, लेकिन अब हालात बदलेंगे और समाज व गांव की तरक्की के नए रास्ते खुलेंगे। किरण, सरपंच प्रत्याशी
बोले पक्ष-विपक्ष
भाजपा सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था को ही बिगाड़ दिया है। पंचायत चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्तियों के हितों पर डाका पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन तरह से चुनाव का माहौल बिगाड़ा है, उसके लिए सरकार को शायद ही ग्रामीण माफ कर पाएं। नरेश शर्मा, पूर्व विधायक
भाजपा ने उन लोगों से हक छीना है, जो कि आरंभ से ही अनपढ़ होने के कारण प्रताड़ित रहे हैं। सरकार को अगर लगता है कि उनका फैसला सही तो एक बार प्रदेश में जनमत संग्रह करा ले, असलियत पता चल जाएगी। भाजपा का फैसला ग्रामीणों के लिए बड़ा सदमा है और शायद ही इससे उबर पाएं।
संजय कबलाना, युवा इनेलो अध्यक्ष
शिक्षा की शर्त लगाना सरकार का गलत निर्णय था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। इतना तय है कि जिले में आधी जनता चुनाव लड़ने के हक से महरूम हो जाएगी। आने वाले समय में सरकार को अपने गलत फैसले का अहसास जरूर होगा। -गीता भुक्कल, विधायक
सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार नहीं, जनता के पक्ष में आया है। जनता पढ़े-लिखे नुमाइंदे चाहती है। हम तो सिर्फ माध्यम बने हैं। लोगों को जब पढ़ी-लिखी गांव की सरकार का असर विकास पर दिखेगा तो इसका विरोध करने वालों को अपनी राजनीतिक जमीन बचानी मुश्किल हो जाएगी। -ओमप्रकाश धनखड़, कृषि मंत्री
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की शर्तों पर रोक लगाई तो लोगों काफी संख्या में चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करा दिए थे। जब छंटनी होनी थी तो सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनाव पर रोक लगा दी थी।
विशाल, डीडीपीओ