14jjrp21- झज्जर। बुजुर्गां को शॉल व कंबल भेंट करते हुए । संवाद
साल्हावास। गांव गोरिया, सासरौली, मातनहेल, बिरोहड, बहु, खानपुर में महिलाएं मंगल गीत गाते हुए बुजुर्गों को मनाने के लिए निकली। गांवों में यह नजारा पूरे दिन देखने को मिला।
मनाने की है परंपरामकर संक्रांति के दिन घर का कोई भी बुजुर्ग या बड़ा ऐसा व्यवहार करने लगता है कि जैसे उसे कोई बात बहुत बुरी लग गई हो। वह बात को भी बताने को तैयार नहीं होते। इतना ही नहीं वह रूठकर पड़ोस में किसी भी घर में जाकर बैठ जाते हैं। इसके बाद महिलाएं बैंडबाजे के साथ लोकगीत गाती हुईं उन्हें मनाने पहुंचती हैं। उन्हें उपहार स्वरूप कपड़े, जूते, गर्म शाॅल, मूंगफली, रेवड़ी, गजक, मूंग की दाल, चावल, रुपये आदि देकर मनाया जाता है और फिर दी गई भेंट को उनके सिर पर रखकर घर लाया जाता है।
गायब हो गया चने का साग
मकर संक्रांति पर चने का साग खाने का बहुत रिवाज था। लोग खेतों में चने का कच्चा साग खाने जाते थे। तोता बनने का भी रिवाज था। लोग चने के खेतों पर जब साग तोड़कर कच्चा खाते थे और कहा जाता था कि हरियल तोता बग गए, परंतु अब जिले में चने की खेती न के बराबर है। इसलिए यह रिवाज लगभग खत्म सा हो गया है। रिवाज की औपचारिकता निभाने वाले भी अब मंडी से चने का साग खरीदकर खाते हैं।