साल्हावास। आजादी का अमृत महोत्सव श्रृंखला के तहत राजकीय महाविद्यालय बिरोहड़ के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग एवं हरियाणा इतिहास कांग्रेस के संयुक्त तत्वावधान में कार्यक्रम हुआ। जिसमें महान स्वतंत्रता सेनानी नेली सेनगुप्त को 49वीं पुण्यतिथि के अवसर पर याद किया गया।
कार्यक्रम के संयोजक एवं इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अमरदीप ने कहा कि नेली सेनगुप्त ब्रिटिश महिला होते हुए भी भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। नेली सेनगुप्त का मूल नाम एडिथ एलेन ग्रे था और उनका जन्म 1886 में कैंब्रिज, इंग्लैंड में हुआ था। उनकी काबिलियत इस कदर थी कि उन्हें 1933 में कलकता में 47 वें वार्षिक सत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया था। वह तीसरी महिला थी जो इस पद पर पहुंची थी। उन्होंने 1904 में सीनियर कैम्ब्रिज पास की। भारत के राष्ट्रवादी नेता यतींद्र मोहन सेनगुप्त से 1909 में विवाह होने से पूर्व वे नेली ग्रे थीं। विवाह के बाद नेली उनके पति के साथ चटगांव आईं और उनकी सहचरी के रूप में 1921 से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। असहयोग आंदोलन के समय उन्होंने पति की जेल यात्राओं के दौरान आम सभाओं को संबोधित किया और जेल गईं।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान नेली सेनगुप्त ने 1931 में दिल्ली में अग्रेजों द्वारा गैर कानूनी घोषित सभा में आजादी की मांग के लिए भाषण देने के कारण चार माह की सजा भुगती। तीस के दशक में जब कई कांग्रेसी नायक जेल में थे, तब उन्होंने निर्भीक होकर राष्ट्रप्रेम का प्रचार किया। 1933 के कोलकाता कांग्रेस के लिए चुने गए अध्यक्ष मालवीय जब पकड़े गए। तब नेली एकमत से अध्यक्ष चुनी गईं और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जमकर प्रचार किया 1940 व 46 में बंगाल लेजिस्लेटिव असेंबली में वे निर्विरोध चुनी गईं। विभाजन के बाद वह पूर्वी पाकिस्तान, वर्तमान बांग्लादेश में रहीं। जहां उनका तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जोरदार स्वागत करते हुए उन्हें भारत की नारी शक्ति का केंद्र बताया था। अक्तूबर 1973 में नेली सेनगुप्त का कलकत्ता, भारत में ही निधन हो गया था। उनका संपूर्ण जीवन त्याग और राष्ट्र प्रेम को समर्पित था।