झज्जर। शहीद हुए कर्ण सिंह बचपन से ही अनुशासनप्रिय था और पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहता था। वह परिवार के साथ-साथ गांव के लोगों को भी मेहनत के लिए प्रेरित करता था। कर्ण से प्रेरित होकर परिवार के चार अन्य सदस्य भी सरकारी नौकरी पर लगे। इसी के चलते कर्ण का नाम गांव में डीसी रख दिया गया था। उन्होंने बताया कि कर्ण की 11 साल कि नौकरी हो चुकी थी और चार साल की नौकरी बाकी थी, लेकिन भगवान को कुछ और ही मंजूर था। उसने गांव के जोहड़ में तैराकी सीखी। उसे तैराकी का शौक था। इसी शौक ने उसे नैवी तक पहुंचाया। वह सात से आठ घंटे तक जोहड़ में तैराकी कर लेता था। कर्ण सिंह सभी को आगे बढ़ने की प्ररेणा देता था। उसकी प्ररेणा से ही उसके छोटे चाचा का लड़का प्रिंस ने मेहनत की और दिल्ली पुलिस में वजीराबाद में उसका चयन हुआ। चाचा धर्मेंद्र ने बताया रविवार शाम 6 बजकर 38 मिनट तक उसकी कर्ण से फोन पर बात हुई थी। कर्ण ने सबका हालचाल जाना और पूछा कि कोई लड़ता तो नहीं है। सबका ख्याल रखना।
पिता ने रिक्शा चलाकर काबिल बनाया, सर्वसम्मति से चुने थे पंच
शहीद कर्ण सिंह के पिता कर्मवीर लोडिंग रिक्शा चलाते थे। चार साल पहले बीमारी के चलते उनका निधन हो गया था। कड़ी मेहनत करके कर्मवीर ने अपने बच्चों को काबिल बनाया। कर्ण का भाई अर्जुन भी सिविल अस्पताल में गार्ड की नौकरी करता है। परिवार का गांव में नाम है। इसी के चलते पिछली योजना में पिता कर्मवीर व चाचा धर्मेंद्र को ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से पंच चुना था।