मंगलवार को पूरे भारत में गोपाष्टमी पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। मगर निरंतर घट रही गायों की उपयोगिता चिंता का विषय बन गई है। गाय केवल एक रोटी निकालने मात्र पूजनीय रह गई है। सड़कों-गलियों में भूखी-प्यासी तड़पती दिखाई देती हैं। गोभक्तों ने गाय की उपयोगिता बढ़ाने की आवाज उठाई है, ताकि हमारी प्राचीन संस्कृति की यह धरोहर बची रहे। अपनी अच्छी नस्ल के लिए हरियाणा की गाय देशभर में प्रसिद्ध है। मगर वर्तमान हालात को देखें तो हमारे यहां बेसहारा गायों की संख्या पालतू गायों से बेहद अधिक हो चुकी है। किसी भी क्षेत्र में गाय भूखी-प्यासी दर-दर की ठोकर खाती देखी जा सकती है। गोशाला प्रधान कुक्कू किलोई, गोभक्त जीते बादली सहित बुजुर्गों का कहना है गाय दरवाजे पर आने के बाद खाली नहीं जानी चाहिए जिसके लिए वह पहले गोसेवा के लिए भरपेट चारे व पानी का प्रबंध तो करते ही थे साथ में उन्हें नहलाने का कार्य भी करते थे। मगर अब हालात यह है कि हरियाणा प्रदेश की गायों का महत्व अपने घर में ही घट गया है। यहीं नहीं प्रदेश की 70 फीसदी से भी ज्यादा गाय सड़कों और गोशालों में है।
यूं भी घट रही गोवंश की उपयोगिता
खेती में मशीन व ट्रैक्टरों के प्रयोग के कारण भी गोवंश की दुर्गति हुई है। प्रदेश भर में गायों की घटती संख्या हैरत करने वाली है जबकि हरियाणा नस्ल की गायों की मांग व उनका दूध सभी जगहों पर पसंद किया जाता रहा है। कृषि विशेषज्ञों, गोपालकों एवं गो सेवकों का कहना है कि गाय के बैलों की उपयोगिता कम होना भी लोगों को गाय न रखने पर विवश कर रहा है।
जीते ने बनाया लक्ष्य
गोसेवक एवं प्रमुख अच्छी नस्लों की दर्जनों गायों का पालन करने वाले जीते बादली का कहना है कि गाय के दूध से विभिन्न प्रकार की औषधियां भी बनाई जाती है। जीते बादली के फार्म पर ब्राजील देश सहित कई प्रमुख देशों की अच्छी नस्लों की गाय हैं। जीते का कहना है कि उनका लक्ष्य गाय की नस्लों में सुधार करना है जिसके लिए उन्होंने अपने फार्म पर विदेशी नस्लों के सांड और गाय रखी हैं।
मिशन : एक रोटी-एक रुपया
गांव पेलपा, बाढ़सा और निमाना पर प्रतिदिन एक रोटी-एक रुपये का लक्ष्य भी रखा गया है। इसके लिए गांव में प्रतिदिन एक रिक्शा निकलती है जिसमें हर घर से एक रोटी और एक रुपए गाय के लिए दान किया जाता है। यह दान राशि और रोटी गोशालाओं में सौंपी जाती है। इस योजनों का लेकर ग्रामीणों अच्छा खासा सहयोग मिल रहा है।