देश व प्रदेश में स्वर्ण क्रांति के उद्भव के बाद कृषि में विविधिकरण बहुत जरूरी है। कृषि विविधिकरण या तो फसल के पैटर्न में बदलाव को दर्शाता या अन्य गैर कृषि विकल्पों को दर्शाता है। उच्च स्तर की आय उत्पन्न करने में मदद करते हैं। इन विकल्पों में पशु पालन, मुर्गी पालन, बागवानी आदि शामिल हैं।
डीसी श्यामलाल पूनिया ने जिला के किसानों का आह्वान करते हुए कहा कि वे अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए कृषि में विविधिकरण को अपनाएं। कृषि विविधिकरण से ग्रामीण क्षेत्रों में अतिरिक्त रोजगार सर्जित होते है। इससे मिट्टी की उर्वरकता बढ़ती है व इससे कीट भी नियंत्रित होते हैं।
कृषि विविधिकरण के दूसरे प्रकार वर्टिकल विविधिकरण के तहत कई फसलों के साथ-साथ औद्योगिकीकरण के के समावेश को दर्शाता है। इसके अंतर्गत किसान एक और कदम उठाते है तथा फसल उत्पादन के साथ-साथ उनसे संबंधित औद्योगिकीकरण में भी निवेश करते हैं। जैसे बागवानी विभाग की बात करें तो किसान बागवानी फसलों में फल, सब्जी, फूल, खुंभी, शहद उत्पादन के साथ-साथ इनसे संबंधित छोटे उद्योग धंधे जैसे फल, सब्जी से संबंधित खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित कर सकते हैं। किसान जैम, जैली, मुरब्बा, चटनी, आचार आदि में निवेश करके अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं।