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देश की सीमा पर न्योछावर की प्रतिमा खंडित

Wed, 02 Mar 2016 01:59 AM IST
झज्जर/बहादुरगढ़
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महापुरुष और शहीदों की कोई जाति नहीं होती, वो तो सभी के पूजनीय, आदरणीय होते हैं। देश की रक्षा के लिए शहीद हुआ रविंद्र छिक्कारा भी किसी जाति का नहीं बल्कि, पूरे देश का बेटा था। हिंसा के दौरान उपद्रवियों ने रविंद्र की प्रतिमा को भी नहीं बख्शा। उपद्रवियों ने शहर में लगी उनकी प्रतिमा को भी खंडित कर दिया। छिक्कारा की प्रतिमा के चेहरे पर ढंका सफेद कपड़ा शायद यही कह रहा है कि मैं आतंकियों से जंग जीत आया पर अपने ही शहर ने मेरा आदर नहीं किया।
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जम्मू में 2000 में हुआ था शहीद
19  जुलाई वर्ष 2000 में जम्मू में आतंकियों से जंग लड़ते हुए शहीद होने वाले झज्जर के गांव खेड़ी आसरा के रविंद्र छिक्कारा की शहादत के बाद उनके अंतिम संस्कार के मौके पर जितना परिजनों का दिल दुखी था। उससे कहीं ज्यादा देश के लिए शहादत देने का गर्व भी था। लेकिन आरक्षण की आग ने उसे इस कद्र खंडित किया कि शहीद का परिवार भी खंडित प्रतिमा को देखने का हौसला नहीं जुटा पा रहा।

धर्मवीर अपने चचेरे भाई की टूटी प्रतिमा पर सफेद चादर डालते हुए इतना भावुक हो गए जैसे मानों छोटे भाई के शरीर पर कफन डाल रहे हों। चौराहे से गुजरने वाले हर देशभक्त को शहीद की प्रतिमा को देख रोना आ रहा है। शहीद की प्रतिमा को एक जाति विशेष का समझ कर तोड़ डाला। कोई ये नहीं देख पाया कि यह किसी जाति का नही बल्कि देश पर जान न्यौछावर करने वाला एक शहीद है।
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मरणोपरांत मिला था कीर्ति चक्र

6 सितंबर 1975 को जन्मे शहीद रविंद्र छिक्कारा ने 12 दिसंबर 1998 में भारतीय सेना में कमीशन हासिल करते हुए लेफ्टिनेंट का पद ग्रहण किया। ये वीर सपूत 19 जुलाई 2000 को देश की सुरक्षा के लिए जम्मू में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गया।

जिसके बाद 26 जनवरी 2001 को तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों शहीद रविन्द्र छिक्कारा के  मरणोपरांत उनके पिता को कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया, लेकिन सैनिक जिस सम्मान और देश भक्ति के लिए शहादत देकर आया एक देश के शहीद का ये अपमान देख शायद कोई भविष्य में शहीद होने की सोचे भी नहीं।

शहीद रविन्द्र छिक्कारा के चचेरे भाई धर्मवीर अपने छोटे भाई की शहादत के दिन भी शायद इतना दुखी नहीं थे जितने प्रतिमा के खंडित होने पर हुए हैं वो तो केवल एक ही बात कहते हैं की उन्होंने इस हिंसा में अपनी रोजी रोटी का जरिया एक मात्र दुकान को अपनी आंखों के सामने जलकर राख होते हुए देखा तब इतना दु:ख नहीं हुआ जितना अपने भाई की प्रतिमा के टूटने से हुआ है। वहीं गांव खेड़ी आसरा निवासी नरेंद्र ने कहा कि वो किसी एक जाति के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए लड़ा था।  फिर भी ऐसा क्यों किया गया।


शहीद की प्रतिमा तोड़े जाने से आहत रविंद्र छिक्कारा के पिता डॉक्टर रत्न सिंह और मां कमला की हिम्मत नहीं बन पायी कि वो अपने शहीद बेटे की टूटी प्रतिमा को देख सकें। उन्होंने मुख्यमंत्री और जिला उपायुक्त  के नाम पत्र लिखकर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है साथ ही भविष्य में प्रतिमा की उचित देखभाल की भी मांग की है।
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