भारत-चीन की लड़ाई में देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद ब्रिगेडियर होशियार सिंह की शहादत को बुधवार को 57 बरस हो जाएंगे। मगर वह अब भी क्षेत्रवासियों के दिलों में जीवित हैं। जब भी कहीं उनका नाम सामने आता है तो बहादुरगढ़ के लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
बहादुरगढ़ उपमंडल के गांव सांखोल के होशियार सिंह वर्ष-1934 में सेना (राजपूताना राइफल्स-2) में राइफल मैन के तौर पर भर्ती हुए और 1940 में हवलदार बन गए। वर्ल्ड वार के दौरान 1941 में किंग कमीशन की अगुवाई की और इसी वर्ष जुलाई में कमिश्नरेट ऑफिसर बन गए। चार मार्च 1942 को कैप्टन और 2 साल बाद सितंबर 1943 में सेना में मेजर पद पर सुशोभित हुए। वह 1947 के बाद मिलट्री एकेडमी देहरादून में चीफ इंस्ट्रक्टर बन गए। 1952 में इनमें राजपूताना राइफल-2 का जिम्मा मिल गया। 1956 में राजपूताना राइफल के दिल्ली स्थित रजिमेंटल सेंटर में कमांडेंट बने। फरवरी 1961 में डिप्टी कमांडेंट बना दिया गया। इसी वर्ष 22 अक्टूबर को ये डिप्टी कमांडेंट से ब्रिगेडियर होशियार सिंह बन गए।
पीएम और सीएम आए थे घर
चीन के साथ युद्ध में जब हालात बिगड़ रहे थे तो ब्रिगेडियर होशियार सिंह सेला पास क्षेत्र में मोर्चा संभाले हुए थे। वीरों की भांति लड़ते-लड़ते वो शहीद हो गए। उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव तक नहीं आ सका। सेना ने ही उनकी अंत्येष्टि की। खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, पंजाब के सीएम प्रताप सिंह कैरों व सेना के बड़े अधिकारी परिवार को सांत्वना देने आए थे। पहली पुण्य तिथि पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी गांव में परिवार से मिलने आई थी।
सरकारी स्कूल में की प्रारंभिक पढ़ाई
होशियार सिंह ने 16 दिसंबर 1916 में गांव सांखोल (बहादुरगढ़) के एक किसान परिवार में जन्म लिया। जन्म के कुछ वर्षों बाद ही इनके पिता शिवलाल का निधन हो गया। पांच भाइयों में सबसे छोटे होशियार सिंह का पालन पोषण मां नान्ही देवी और बड़े भाई अमर सिंह ने किया। गांव के प्राइमरी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के बाद होशियार सिंह ने बहादुरगढ़ के रेलवे रोड स्थित सरकारी स्कूल में दाखिला लिया। गांव से 2 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे। वर्ष-1932 में फर्स्ट डिवीजन से मैट्रिक पास की।
कबड्डी के माहिर खिलाड़ी थे
होशियार सिंह कबड्डी के माहिर खिलाड़ी थे। वर्ष-1935 में उनका विवाह नौनंद गांव (रोहतक) की फीम कौर के साथ हुआ। जिससे उनकी एक बेटी समेत पांच संतानें हुईं। होशियार सिंह के शहीद होने के बाद इनकी पत्नी पत्नी फीम कौर की तबीयत खराब रहने लगी। पांच वर्ष बाद 1967 में अपने भाई के यहां फीम ने अंतिम सांस ली। फिलहाल ब्रिगेडियर होशियार सिंह की सबसे बड़ी बेटी राजवंती एवं छोटे बेटे बलराज, देवराज, गजेंद्र जीवित हैं। एक बेटे राजेंद्र का देहांत हो चुका है। गांव सांखोल में इनके परिवार के सदस्य आज भी रह रहे हैं।
मेट्रो स्टेशन व सड़क नाम पर
शहीद ब्रिगेडियर होशियार सिंह की याद में बहादुरगढ़ और देहरादून में खेल स्टेडियम हैं। दिल्ली में सरोजनी नगर के पास एक सड़क भी इनके नाम से है। बहादुरगढ़ में भी एक मार्ग इनके नाम से है। रोहतक-दिल्ली रोड पर बीडीओ आफिस के पास इनकी प्रतिमा लगी है। पिछले साल सिटी पार्क मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर इनके नाम पर रखा गया है।