एक नहीं, दो नहीं बल्कि 42 बार खून दान कर मानवता की सेवा का परिचय देने वाले प्रदीप को जब खुद जरूरत पड़ी तो उसे खून नहीं मिल सका।
निजी और सरकारी अस्पतालों ने हाथ खड़े कर दिए। इस मामले को अमर उजाला ने रविवार को खबर प्रकाशित करके उठाया। खबर का असर हुआ और लोग प्रदीप की मदद के लिए आगे आए।
केवल बहादुरगढ़ शहर ही नहीं गांवों और रोहतक से भी प्रदीप की मदद के लिए हाथ उठे। प्रदीप को चार यूनिट रक्त की जरूरत थी, जो पूरी हो गई है। प्रदीप के परिजनों ने अमर उजाला को थैंक्यू कहा।
लापरवाह विभाग
कानोंदा निवासी रोहित ने अमर उजाला में खबर पढ़ी और अमर उजाला के बहादुरगढ़ ऑफिस के माध्यम से खून देने के लिए प्रदीप के परिजनों से संपर्क किया। इससे पहले, उन्होंने सिविल अस्तपाल की इंक्वायरी में फोन किया। मगर वहां तैनात कर्मचारी का रवैया बेहद अजीब रहा।
फोन एक महिला ने उठाया और हैलो बोलकर काट दिया। उन्होंने 12 बजकर 12 मिनट, 12 बजकर 13 मिनट और 12 बजकर 14 मिनट पर कॉल की। मगर हर बार ऐसा ही वाकया हुआ। उक्त कर्मचारी ने बात नहीं की। रोहित ने कहा कि यह बेहद ही लापरवाही है। इन हालात में अगर कोई किसी की मदद करे भी तो कैसे करे। विभाग की लापरवाह है।
रोहतक से भी आया फोन
रोहतक के सुखपुरा चौक निवासी राहुल ने यह खबर पढ़ी तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने अमर उजाला ऑफिस के माध्यम से प्रदीप के परिजनों के साथ संपर्क साधा।
राहुल ने कहा कि एक व्यक्ति मानवता के लिए 42 बार खून दान करता है और आज खुद बेबस हो गया। हैरानी की बात है कि बहादुरगढ़, झज्जर और रोहतक में प्रदीप के लिए खून की व्यवस्था नहीं हो पाई।
चूंकि उनका ब्लड ग्रुप प्रदीप के ब्लड ग्रुप से मैच होता, इसलिए उन्होंने बहादुरगढ़ में प्रदीप के परिजनों से संपर्क किया। हालांकि तब तक प्रदीप के लिए रक्त का इंतजाम हो चुका था।
थैंक्यू अमर उजाला
प्रदीप की मदद के लिए समाचार प्रकाशित करने पर प्रदीप के परिजनों और पाठकों ने अमर उजाला का धन्यवाद किया।
राहुल ने कहा कि अखबारों को ऐसी खबरें प्रमुखता से छापनी चाहिए ताकि किसी जरूरतमंद की समय पर मदद हो सके और विभागों की अव्यवस्थाएं भी सामने आएं। प्रदीप के भाई धर्मपाल ने बताया कि उनके पास कई लोगों के फोन आए।