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किसान आंदोलन : किसानों का दर्द-परिवार की याद तो आती है, पर खेती ही न रही तो क्या करेंगे 

Mon, 11 Jan 2021 01:20 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बहादुरगढ़ (हरियाणा)
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किसान आंदोलन में धरने पर बैठे किसान। - फोटो : फाइल फोटो
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पिछले डेढ़ माह से टीकरी बॉर्डर-बहादुरगढ़ पर धरना दे रहे किसान तमाम प्रकार की घरेलू चिंताओं के बावजूद यहां डटे हैं। कोई बेटी के विवाह की तैयारियों को छोड़कर आया है, तो किसी के पोते-पोती दादा-दादी के प्यार से वंचित हो रहे हैं। लेकिन इनका संकल्प पक्का है। इन किसानों को लगता है कि खेती की रक्षा के लिए घरेलू चिंता कुछ समय और भी झेलनी पड़ें तो कोई बात नहीं।

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मोगा से आए 62 वर्षीय तेजपाल सिंह ने बताया कि वह 26 नवंबर को पहले ही दिन यहां आ गए थे। घर में ढाई साल की पोती अमनप्रीत के साथ वह दिनभर खेलते रहते थे, लेकिन डेढ़ माह से पोती से मिल भी नहीं पाए। पत्नी का फोन आया कि बच्ची न कुछ खा रही और न दूध पी रही है। उसकी दादी ने वीडियो कॉल करवाई, तो वह रोती रही। बोली, दादा के पास जाऊंगी, लेकिन हम मजबूर हैं। किसान आंदोलन को पार लगाना है।

बेटी की शादी की तैयारियां बीच में छोड़ी 
बठिंडा से आए 48 वर्षीय सतवंत सिंह आंदोलन में शामिल होने से पहले बेटी की शादी की तैयारी कर रहे थे। खरीदारी के लिए उन्हें बार-बार बाजार जाना पड़ता था। तब पंजाब में आंदोलन चल रहा था। उसी दौरान एक रिश्तेदार और साथियों ने तीन कानूनों के बारे में समझाया और आंदोलन में शामिल होने के लिए कहा। सतवंत सिंह कहते हैं कि खेती को बचाने के लिए मुझे भी टीकरी बॉर्डर आना पड़ा, तभी से शादी की तैयारियां ठप पड़ी हैं। पत्नी का फोन आता है कि जल्दी आ जाओ, लेकिन मांगें पूरी होने तक वापस नहीं जाऊंगा।

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बहादुरगढ़ के नया बस अड्डा परिसर में अपनी ट्रॉली में ठहरे मानसा के गांव सदा सिंहवाला के निवासी 58 वर्षीय गुरमीत सिंह और उनके गांव के कुल 19 लोग 26 नवंबर को आए थे, जिसमें चार महिलाएं भी थीं। गुरमीत सिंह को छोड़ बाकी सभी किसान कुछ-कुछ रोज के लिए अपने घर हो आए। लेकिन गुरमीत सिंह लगातार डटे हैं। अपने परिवार में बहुत विनम्र स्वभाव वाले गुरमीत सभी को अच्छे लगते हैं। इसलिए परिवार के सभी लोग उनसे मिलने यहां आते हैं। बड़े भाई कुलवंत, दोनों बेटे अमनजोत सिंह व मनबीर सिंह, पत्नी मंजीत कौर, बहन अमरजीत कौर और भानजे नरेंद्र व हरजिंदर भी उनसे मिले। भाई दो दिन रुके और बाकी लोग तीन-तीन दिन ठहरे। सभी ने आंदोलन में भी भागीदारी कर ली और परिवार के मुखिया से भी मिल गए। गुरमीत सिंह कहते हैं तीनों कानून वापस होने चाहिए। फिलहाल की तरह सरकारी मंडियां रहनी चाहिए और एमएसपी मिलना चाहिए।


राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर की तहसील सादुलशहर के गांव चक धौला से दो ट्रैक्टरों में 15 ग्रामीण 26 नवंबर को ही यहां पहुंच गए थे। इनमें से कुछ किसान आठ-दस दिन ठहर कर घर चले जाते हैं तो उतने ही दूसरे लोग गांव से आ जाते हैं। शुरू से ही यहां ठहरे हरभजन सिंह ने बताया कि पीछे से घर में पड़ोसी और भाईचारे के लोग उनके पशुओं और खेती को भी संभाल लेते हैं। परिवार से दूर मन लगने या न लगने के सवाल पर उन्होंने कहा कि खेती ही चली जाएगी तो घरों में परिवार के साथ रहकर क्या करेंगे।


गांव चक धौला के ही निवासी जसविंदर सिंह ने कहा कि वे कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन एमएसपी पर पूरी उपज नहीं बिकती तो बेहद कष्ट होता है। इलाके में सरसों का उत्पादन ज्यादा है और सरकार केवल 25 क्विंटल सरसों एमएसपी पर खरीदती है। बाकी सरसों उन्हें सस्ते दाम में व्यापारी को देनी पड़ती है। सरकार को कानून तो पूरी उपज एमएसपी पर खरीदने के लिए बनाना चाहिए था, लेकिन मंडियों को निजी हाथों में सौंपकर उल्टा सरकारी खरीद को ही बंद करना चाहती है। 
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