बहादुरगढ़ के नया बस अड्डा परिसर में अपनी ट्रॉली में ठहरे मानसा के गांव सदा सिंहवाला के निवासी 58 वर्षीय गुरमीत सिंह और उनके गांव के कुल 19 लोग 26 नवंबर को आए थे, जिसमें चार महिलाएं भी थीं। गुरमीत सिंह को छोड़ बाकी सभी किसान कुछ-कुछ रोज के लिए अपने घर हो आए। लेकिन गुरमीत सिंह लगातार डटे हैं। अपने परिवार में बहुत विनम्र स्वभाव वाले गुरमीत सभी को अच्छे लगते हैं। इसलिए परिवार के सभी लोग उनसे मिलने यहां आते हैं। बड़े भाई कुलवंत, दोनों बेटे अमनजोत सिंह व मनबीर सिंह, पत्नी मंजीत कौर, बहन अमरजीत कौर और भानजे नरेंद्र व हरजिंदर भी उनसे मिले। भाई दो दिन रुके और बाकी लोग तीन-तीन दिन ठहरे। सभी ने आंदोलन में भी भागीदारी कर ली और परिवार के मुखिया से भी मिल गए। गुरमीत सिंह कहते हैं तीनों कानून वापस होने चाहिए। फिलहाल की तरह सरकारी मंडियां रहनी चाहिए और एमएसपी मिलना चाहिए।
राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर की तहसील सादुलशहर के गांव चक धौला से दो ट्रैक्टरों में 15 ग्रामीण 26 नवंबर को ही यहां पहुंच गए थे। इनमें से कुछ किसान आठ-दस दिन ठहर कर घर चले जाते हैं तो उतने ही दूसरे लोग गांव से आ जाते हैं। शुरू से ही यहां ठहरे हरभजन सिंह ने बताया कि पीछे से घर में पड़ोसी और भाईचारे के लोग उनके पशुओं और खेती को भी संभाल लेते हैं। परिवार से दूर मन लगने या न लगने के सवाल पर उन्होंने कहा कि खेती ही चली जाएगी तो घरों में परिवार के साथ रहकर क्या करेंगे।
गांव चक धौला के ही निवासी जसविंदर सिंह ने कहा कि वे कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन एमएसपी पर पूरी उपज नहीं बिकती तो बेहद कष्ट होता है। इलाके में सरसों का उत्पादन ज्यादा है और सरकार केवल 25 क्विंटल सरसों एमएसपी पर खरीदती है। बाकी सरसों उन्हें सस्ते दाम में व्यापारी को देनी पड़ती है। सरकार को कानून तो पूरी उपज एमएसपी पर खरीदने के लिए बनाना चाहिए था, लेकिन मंडियों को निजी हाथों में सौंपकर उल्टा सरकारी खरीद को ही बंद करना चाहती है।