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30 मार्च : 234 किसान, 8 घंटे और घोटाला 60 लाख का

Sat, 02 Jan 2016 01:39 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला झज्जर
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खेतों में सिंचाई के लिए भूमिगत पाइप लाइन व फव्वारा लगाने में सामने आए 1 करोड़ 07 लाख रुपये के घालमेल में कृषि विभाग के अधिकारियों के बीच गजब की जुगलबंदी रही।
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विजिलेंस की मानें तो हर कोई इसमें मास्टरमाइंड रहा। जांच में चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि 30 मार्च, 2011 को एक ही दिन में योजना के तहत 234 किसानों के आवेदन लिए गए।

इसी दिन एफिडेविट लिए गए, इसी दिन आवेदकों का ड्रा, वेरिफिकेशन, फर्म की पहचान, पाइपों की खरीद आदि कर उसी दिन किसानों के खेतों में पाइप लाइन दबाकर फव्वारे चालू कर दिए गए।
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जिन किसानों का स्वर्गवास हो चुका था या जिनके खेत ही नहीं थे, उनके नाम भी झूठे आवेदनों के जरिये घोटाला हुआ। योजना में 443 किसानों को बहकाकर लाखों की राशि हड़प ली गई।

विजिलेंस ने बाद में इस घोटाले में 27 जुलाई 2013 को मुकदमा नंबर-20 दर्ज कर आरोपियों की धरपकड़ का काम शुरू किया।

2.50 करोड़ में से 1.07 करोड़ का गबन
वर्ष 2010-11 के वित्तीय वर्ष में झज्जर जिले में फव्वारा सिंचाई विधि को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने सब्सिडी युक्त योजना दी। इसके लिए जिले में 2 करोड़ 56 लाख 87 हजार 544 रुपये खर्च हुए।

योजना से विभिन्न क्षेत्रों के 443 किसानों को जोड़ा गया। पाइप इत्यादि खरीदने के लिए विभिन्न चार इंडस्ट्री को सरकार की ओर से मान्यता दी गई थी।

योजना में 9 महीने तो बिना किसी प्रकार की कार्रवाई के गुजर गए, लेकिन नव वर्ष 2011 शुरू होने के साथ ही कृषि विभाग के योजना से जुड़े अधिकारी हरकत में आ गए।

तीन महीने जनवरी, फरवरी और मार्च में विभाग में नीचे से ऊपर के लेवल तक खूब जेबें गर्म हुईं। विजिलेंस के अनुसार कुल बजट में से कृषि अधिकारियों ने 1 करोड़ 07 लाख रुपये का गबन किया।

शुक्रवार को मामले में गिरफ्तार हुए मंडल भूमि संरक्षण अधिकारी ओम प्रकाश गोदारा की भूमिका विजिलेंस ने 60 लाख रुपये घोटाले में आंकी है।

हाथ से नहीं निकलने दिया बजट
30 मार्च, 2011 यानी कि वित्त वर्ष के समाप्त होने से पहले के दिन तो कृषि अधिकारियों ने सारी सीमाएं लांघ दी। दो दिन में बजट लैप्स हो जाना था।

फव्वारा सिंचाई योजना के लिए साल में जो बजट मिला था, उसमें जो भी 31 मार्च को बचता वह वापस सरकार के खाते में चला जाता।

बजट हाथ से निकलने की बजाय जेबों में जाए, इसके लिए 234 किसानों को मोहरा बनाया गया। 30 मार्च को ही इनके आवेदन लेने से लेकर खेतों में पाइप लाइन लगाने तक की पूरी प्रक्रिया 8 से 10 घंटों में निपटा दी गई। किसानों के फर्जी आवेदन, फर्जी एफिडेविट, फर्म के फर्जी बिल आदि तैयार किए गए।

इसलिए थी योजना
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह से किसान खेतों में फसलों की सिंचाई करते हैं, उससे ज्यादा पानी वेस्ट होता है। फव्वारा विधि फसलों की सिंचाई का एक बेहतर तरीका है।

इसमें ट्यूबवेल से भूमिगत पाइप के साथ खेत के विभिन्न हिस्सों में पानी पहुंचाकर फव्वारे लगाकर बरसात की तरह फसल में पानी डाला जाता है। पानी व समय दोनों की इसमें बचत होती है और फसल का उत्पादन भी बेहतर होता है। सरकार किसानों को इसमें सब्सिडी मुहैया कराती है।

ऐसे जांच हुई शुरू
योजना में गड़बड़झाल हुआ है, इसको लेकर किसान तत्कालीन डीसी अजीत बालाजी जोशी के पास शिकायत लेकर पहुंचे। एक के बाद एक कई शिकायतें आईं तो डीसी ने जांच तत्कालीन सीटीएम प्रदीप कौशिक को सौंप दी। किसानों के आरोपों की जांच सही पाई गई।

इसी बीच घोटाले की भनक विजिलेंस को लगी तो इंस्पेक्टर ओमप्रकाश भारद्वाज ने जांच शुरू कर दी। जांच के बाद उन्होंने वर्ष 2012 में सोर्स रिपोर्ट विभाग के माध्यम से सरकार को पेश कर दी। इसी के आधार पर जांच जारी रही और अंत में विजिलेंस ने 27 जुलाई 2013 को योजना में हुई धोखाधड़ी पर मुकदमा नंबर 20 दर्ज कर लिया गया।

ऐसे अंजाम दिया घोटाला
विजिलेंस इंस्पेक्टर ओमप्रकाश भारद्वाज ने बताया कि अधिकारियों ने योजना में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी से जेबें भरी। किसानों को बहकाकर उनसे आवेदन आदि ले लिए गए।

न तो अधिकतर किसानों के खेतों में पाइप लाइन ही बिछी और न ही फव्वारे लगे। मामला दबाने के लिए अधिकारियों ने कुछ किसानों को 10-10 हजार तो किसी को 6 हजार तो किसी को कुछ नहीं दिया। सब्सिडी हड़प लिए गए। राशि चरखी दादरी की श्री लक्ष्मी इंडस्ट्री को जारी की गई।

आईएसआई मार्का पाइपों की खरीद होनी थी, लेकिन साधारण पाईप खरीद लिए लिए। किसानों द्वारा पहले से ही खेतों में अपने स्तर पर दबाई गई भूमिगत पाइप लाइन के अगले व अंत के सिरे पर घटिया क्वालिटी की नई पाइप लगा दी गई। बीच में पहले वाली पाइप मिली।

अब जिन फर्मों से आईएसआई मार्का पाइप खरीदने के बिल दिए गए, उन फर्मों ने इस प्रकार के पाइप बेचे जाने से इनकार किया। बताया कि उनके फर्जी बिल बनाए गए हैं।

खास बात रही कि कुछ मृत किसानों के नाम पर भी सब्सिडी हड़प ली गई। जांच में कई किसान ऐसे मिले जिनके पास जमीन ही नहीं थी, फिर पाइप दबाए कहां। कृषि विभाग में किसी भी स्तर पर पूरी योजना की वेरिफिकेशन, तकनीकी निरीक्षण आदि नहीं हुआ। फाइल जिस भी अधिकारी के टेबल पर पहुंची, पास हो गई।
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