धान की फसल बोने से होने वाले जलभराव और बाद में पराली जलाने की समस्या को रोकने के लिए झज्जर के माजरा दूबलधन गांव ने अच्छी पहल की है। पिछले करीब तीन दशकों से धान बोकर अपना गुजर-बसर कर रहे इस गांव के किसानों ने इस बार धान की बजाय मक्का, बाजरा, अरहर जैसी फसलें बोने का सामूहिक निर्णय लिया है। इस फैसले का मुख्य कारण गांव के करीब एक हजार एकड़ में गेहूूं की फसल की बिजाई न हो पाना भी रहा है। अब गांव के हित के मद्देनजर किसानों ने गांव के पूर्व सरपंच ओमप्रकाश की अध्यक्षता में एक पंचायत का कर यह अहम फैसला लिया है। पंचायत में हुए फैसले के अनुसार गांव माजरा दूबलधन में धान की फसल पैदा करने पर पूर्णत: प्रतिबंध रहेगा। यही नहीं पंचायत के इस फैसले को अमली जामा पहनाने के लिए किसानों ने न केवल एकजुटता से इस पर अटल रहने बल्कि अन्य लोगों को इस बारे जागरूक करने का निर्णय लिया है।
ग्रामीणों की मानें तो बीते कई वर्षों में धान की फसल से गांव में जलभराव की स्थिति आ गई वहीं जल निकासी का प्रबंध नही हैं। इसके चलते इन किसानों की करीब एक हजार एकड़ धान की फसल खराब हो गई वही काफी एरिया में गेहूं की बिजाई तक नहीं हो सकी। वहीं धान को कई बार पानी देना पड़ता है जबकि अन्य फसलों में पानी की मात्रा भी कम प्रयोग होती है। बात मुनाफे की करें तो धान में किसानों को करीब बीस हजार रुपये प्रति एकड़ तक ही लाभ मिल सकता था लेकिन अन्य फसलों में बचत भी इससे दोगुनी होती है। अब इसी समस्या से निजात पाने के लिए गांव के किसानों से एकस्वर में धान की फसल की बुुआई न कर कम लागत व अधिक मुनाफे की फसलें बोने का निर्णय लिया है। गांव के पूर्व सरपंच ओमप्रकाश, मा. जयभगवान, कैप्टन रामप्रसाद , राजेश, रामसिंह, राजबीर आदि ने इस फैसले में ग्रामीणों द्वारा प्रदर्शित एकजुटता की सरहाना भी की है।