झज्जर। राजकीय महाविद्यालय बिरोहड़ के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग एवं हरियाणा इतिहास कांग्रेस के संयुक्त तत्वावधान में महान क्रांतिकारी कैप्टन लक्ष्मी सहगल की 108वीं जयंती के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के संयोजक एवं इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. अमरदीप ने कहा कि कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजाद हिंद फौज की रानी झांसी ब्रिगेड की कमान संभाली थी।
उन्होंने बताया कि 24 अक्टूबर 1914 को चेन्नई में जन्मीं लक्ष्मी स्वामीनाथन बचपन से ही अपने कार्यों के लिए विख्यात थी। लक्ष्मी सहगल का ठोस विचार था कि स्वतंत्रता तीन रूपों में आती है, पहली विदेशी साम्राज्यवाद से मुक्ति जो राजनीतिक आजादी है। इसका दूसरा स्वरूप आर्थिक है और तीसरा सामाजिक स्वतंत्रता है। सामाजिक स्वतंत्रता के इसी क्रम में उन्होंने पहला विद्रोह बचपन में जातीय बंधनों को तोड़ते हुए निम्न वर्गों के बच्चों के साथ खेलने के साथ किया जिसका सबसे ज्यादा विरोध उनकी दादी करती थीं। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद लक्ष्मी ने मेडिकल की पढ़ाई शुरू की और 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से परीक्षा पास करके एक डॉक्टर बन गईं। द्वितीय विश्व युद्ध के लिए जब भारतीयों की भर्ती के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सरकार का साथ नहीं देने का वचन लिया। उसी समय लक्ष्मी सहगल अपने रिश्तेदारों के पास सिंगापुर चली गईं और निजी रूप से चिकित्सक का कार्य करने लगी। उसी समय आजाद हिंद फौज की कमान सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में संभाल ली थी। लक्ष्मी सहगल ने सुभाषचंद्र बोस के साथ 5 घंटे की लंबी मीटिंग की और रानी झांसी ब्रिगेड का गठन हुआ।
8 जुलाई, 1943 को रानी झांसी रेजिमेंट में महिलाओं की भर्ती शुरू हुई और 1500 स्वतंत्रता सेनानी और 200 नर्सों को इस रेजिमेंट में शामिल किया गया। 3 महीने की कड़ी ट्रेनिंग के बाद लक्ष्मी समेत अन्य महिलाएं युद्ध मोर्चे की ओर रवाना हुई। बर्मा के मध्य तक ही रानी झांसी रेजिमेंट बढ़ पाई। इंफाल में फौज ने जापानी आर्मी के साथ मिलकर हमला किया था जिसे अंग्रेजों ने बुरी तरह दबाया और हारकर फौज को वापस लौटना पड़ा। उसी समय फौज ने बर्मा में ही अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब दिया। गौरतलब है कि रानी झांसी रेजिमेंट को निरस्त कर दिया गया और बर्मा में उनकों परिवारों के पास वापस भेजा गया। कोई भी सिपाही जाने को तैयार नहीं थी और सभी ने खून से दस्तखत की हुई चिट्ठी नेताजी को भेजी। इसके बाद लक्ष्मी सहगल ने आजाद हिंद फौज के अस्पताल में अपनी सेवाएं देने का निर्णय लिया। जून 1945 में लक्ष्मी और फौज के कई लोग गिरफ्तार कर लिए गए। लक्ष्मी को रंगून भेजा गया और नजरबंद रखा गया। मार्च, 1946 में लक्ष्मी को वापस भारत भेज दिया गया।
डॉ. अमरदीप ने बताया कि आजादी के बाद आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्ति के राह पर चलते हुए उन्होंने कमजोर और निम्न वर्गों के उत्थान का रास्ता अपनाया। 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान लक्ष्मी ने बॉर्डर के आस-पास के क्षेत्रों में लोगों की मदद की। बाद में कोलकाता में कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट) ज्वाइन की। 1981 में लक्ष्मी ने आल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमेंस एसोशिएशन की स्थापना की और महिलाओं की दशा बदलने के लिए उन्होंने ता-उम्र संघर्ष किया। आज विद्याथियों का ऐसी महान योद्धा से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।