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संकट के दौर से गुजर रहे लोक विधाओं के कलाकार

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बहादुरगढ़। लोककला के जरिये लोगों का मनोरंजन करने वाले लगभग सभी विधाओं के कलाकार आज संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कोरोना महामारी के चलते लगाए गए लॉकडाउन ने रोज कमाकर रोज खाने वाले वाले इन कलाकारों की रोजी-रोटी छीन ली है। इन कलाकारों को बीमारी का इलाज करवाना, अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ाना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।
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यू-ट्यूब और टीवी स्क्रीन के सहारे सफलता पा रही रागिनी आदि एक दो विधाओं के चुनिंदा लोक कलाकारों को छोड़ दें तो बाकी विधाओं के कलाकार फिलहाल गरीबी की मार झेल रहे हैं। जंगम जोगी, सारंगी जोगी, बीन जोगी, गुग्गा गाथा गायन डेरू, डमरू वादक, सांग के कलाकार, रागिनी गायक व साजिंदे, लोक नृत्य कलाकार व लोकगायन कलाकारों ने पिछले कई दशक में ऐसा संकट कभी नहीं देखा। समाज में खुशहाली रहे तो इन लोक कलाकारों की रोजी रोटी रहती है। लेकिन फिलहाल डेढ़ साल से रोजी-रोटी सब बंद है। जंगम जोगियों को तीज-त्योहारों, गीता जयंती समारोह, सूरजकुंड मेले और अन्य मेलों में काम मिल जाता था। हालांकि अब प्रदेश में इनकी बहुत कम संख्या रह गई है। वरिष्ठ जंगम जोगी राजकुमार जंगम ने बताया कि डेढ़ साल से कोरोना संकट की वजह से घर बैठे हैं। रोटी मिलनी मुश्किल हो गई है।
सारंगी जोगियों को प्रदेश में, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्र में अपना खास महत्व रहा है। ये सारंगी पर बेहद मधुर धुन व गायन से लोगों का मनोरंजन करते थे। भादवे (भाद्रपद) के महीने में जब गाय-भैंस आदि पशुओं में मुंह-खुर की बीमारी फैल जाती थी तो इन जोगियों को गांव में मदद के लिए बुलाया जाता था। हांसी के निवासी मनमोहन शर्मा बताते हैं कि सारंगी पर भगवान से इनकी प्रार्थना का इतना असर होता था पशुओं में फैली मुंह-खुर की बीमारी खत्म हो जाती थी। बम लहरी की ओजस्वी शैली में भगवान शंकर के भजन गाने वाले ये कलाकार पूरे हरियाणा में फिलहाल लगभग 70 बचे हैं। कला को सम्मान नहीं के कारण अब इनका गुजारा मुश्किल हो गया है, इसलिए इन परिवारों की नई पीढ़ियां ये रास्ता नहीं अपना रही। दुर्भाग्य की बात है कि चुनिंदा बचे कलाकारों में जींद के गांव किठाना के 87 वर्षीय जोगी प्रताप सिंह चौहान और हांसी के सतबीर सिंह को अब रोटी मिलनी भी दूभर हो गई है।
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बीन जोगी (सपेरे) विवाह समारोहों, मेलों और अन्य उत्सवों में लोगों का मनोरंजन करते थे। झज्जर जिले के गांव खेतावास, फरीदाबाद के निकट इमामुद्दीन पुर, चांदपुर, चीरसी, कबूलपुर, अरुआ व भुपानी और दिल्ली के मोलड़बंद समेत प्रदेश के कई गांवों में बीन जोगियों के एक हजार से अधिक परिवार रहते हैं। ये बीन जोगी अपनी प्रस्तुति से बड़े-बड़े समारोहों की शान बढ़ाते हैं। शहरों व गांवों में बीन की धुनों पर सांप और सांप नेवले का खेल दिखाकर गुजारा करते हैं। सांप और बिच्छू के डसने का इलाज भी करते हैं। लेकिन आजकल न बड़े समारोह हो रहे हैं और न ये लोग गांव-शहर में अपनी कला का प्रदर्शन कर पा रहे हैं। जिससे भुखमरी की स्थिति में हैं।
नगाड़ा कलाकारों की हालत भी खराब है। पलवल के पास गांव बंचारी में लगभग 2500 नगाड़ा कलाकार रहते हैं। यहां के निवासी वरिष्ठ कलाकार रणजीत सिंह की तो 11 मई को कोरोना से संक्रमण से मौत हो गई। ये कलाकार सूरजकुंड में हर साल लगने वाले अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले, कुरुक्षेत्र के सूर्यग्रहण मेले, बड़े-बड़े उत्सवों और बड़ी-बड़ी रैलियों में नगाड़े की थाप पर नृत्य करते हैं। इनकी कमाई का यही सबसे बड़ा जरिया है। लेकिन कोरोना के चलते इस तरह के आयोजन न होने से इन परिवारों की रोजी रोटी भी खत्म हो गई है।
गुग्गा गाथा गायन कलाकारों की उपस्थित भी प्रदेश से सैकड़ों गांवों में है। ये लोग भादवे में छड़ी लेकर गांव-गांव शहर-शहर घूमते हैं। गुग्गा गाथा गायन करते हैं। समाज के लोग इनके गुजारे की जिम्मेदारी भी उठाते रहे हैं। सूरजकुंड मेले व कुरुक्षेत्र में लगने वाले सूर्यग्रहण मेले जैसे आयोजनों में भी आगंतुकों के मनोरंजन के लिए इनकी कला का प्रदर्शन करवाया जाता है। जींद जिले के गांव बराह के निवासी दिलवारा सिंह, ब्रह्म सिंह और जीत सिंह ने बताया कि जब समाज में हमारी जिम्मेवारी उठाने वाले सभी वर्गों की आर्थिक हालत को ही कोरोना ने बिगाड़ दिया है तो हमें कौन सहारा देगा।
प्रदेश में सांग, रागिनी, लोक नृत्य, लोक संगीत कलाओं से जुड़े छोटे-बड़े 250 से अधिक दल हैं। इनमें कुछ बड़े कलाकारों को छोड़ बाकी सभी परेशान हैं। सहायक कलाकारों की हालत तो बहुत अधिक खराब है। मंच के कलाकार दिनेश कुमार का कहना है कि मंच कलाकारों और रागिनी गायकों को भी कार्यक्रम नहीं मिल रहे। वे बड़ी समस्या में हैं। सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं और संपन्न समर्थ लोगों को कलाकारों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।
मशहूर लोक कला प्रशिक्षक शीशपाल पूर्णकालिक कलाकार हैं। कॉलेजों, विश्वविद्यालयों समेत तमाम बड़ी शिक्षा संस्थाओं में दैनिक पारिश्रमिक पर प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन आजकल सभी बंद हैं। इसलिए बड़ी मुश्किल हो गई है। परिवार में स्वयं सहित पिता, भतीजा, दो बेटी, एक बेटा व पत्नी सहित सात सदस्य हैं। पैसे के अभाव में बच्चों का दाखिला भी नहीं करवा पा रहे। फरवरी 2020 से खाली हैं। कहते हैं अब तो सूखी मिल जाए तो सूखी और आधी मिल जाए तो आधी खा लेते हैं। उम्मीद कायम है, सब कुछ खुल जाए तो गुजारा हो जाएगा। सरकार से ही उम्मीद कर सकते हैं।
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