अमर उजाला ब्यूरो
चरखी दादरी। बीकॉम के छात्र एवं गांव मौड़ी निवासी अमित ने एक ऐसा प्रोजेक्ट तैयार किया है जिसे देखने वाला हर कोई उसका मुरीद बन जाता है। अमित ने रोडवेज विभाग से कंडम बस खरीदकर उसे 21 दिन में मल्टीपर्पज सोलर एंबुलेंस बस का लुक दिया है। बाहर से देखने में यह हरियाणा रोडवेज की बस जैसी दिखती है लेकिन अंदर से इसका ढांचा वॉल्वो और एरोप्लेन जैसा दिखता है। इस बस को एंबुलेंस के अलावा परिवहन सेवा के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है। अमित का कहना है कि यह 1.20 करोड़ कीमत वाले वॉल्वो जैसी सवारी देगी। खास बात यह है कि बस डीजल के अलावा सोलर सिस्टम से भी चलाई जा सकती है। दोनों विकल्प सुविधा के अनुसार दिए हैं। उसके अनुसार बस को तैयार करने में 12 लाख रुपये कर्ज भी लेना पड़ा है।
मौड़ी निवासी किसान रतिराम फौगाट के बेटे के सोलर एंबुलेंस बस की चर्चा अब आसपास के गांवों और क्षेत्रों में होने लगी है। अमर उजाला से बातचीत में अमित फौगाट ने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर 2012 से ही लगातार काम कर रहा था। लंबी जद्दोजहद के बाद उसे दो लाख रुपये में रोडवेज की कंडम बस मिल पाई। जब वह बस लेकर गांव आया तो कुछ ने ताने भी मारे लेकिन वह इन्हें अनसुना कर बस को तैयार करने में जुट गया। अमित ने बताया कि रुपयों के अभाव में कई माह तक वह इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं कर पाया लेकिन अक्तूबर माह में उसने काम शुरू किया और 21 दिन के अंदर बस तैयार हो गई।
मल्टीपर्पज बस के बारे में अमित ने बताया कि इस बस में दो कंपार्टमेंट बनाए हैं। इसमें से एक में 22 सीट बैठने का प्रावधान है जबकि दूसरे कंपार्टमेंट में छह लोगों के लेटने की व्यवस्था है। इसके अलावा बस को वातानुुकूलित रखने के लिए डेढ़-डेढ़ टन के दो एससी लगाए हैं। वहीं, इसके अंदर एक 32 इंच की स्क्रीन भी लगी हुई है। उसने बताया कि बस को अगर एंबुलेंस के तौर पर प्रयोग किया जाए तो एकसाथ 22 सामान्य मरीजों के अलावा छह गंभीर मरीजों को भी एक साथ एक अस्पताल से दूसरे बड़े अस्पताल ले जाया जा सकता है। बस की छत पर 10 सोलर प्लेटें (3250 वॉट), आठ बैटरी (1200 वॉट) और पीसीयू (इलेक्ट्रिसिटी, बैटरी व सोलर) सिस्टम लगाया गया है।
2012 में राष्ट्रपति से मिला सम्मान, सरकार ने नजरअंदाज किया
अमित ने 12वीं कक्षा में अपना पहला प्रोजेक्ट तैयार किया था। इस प्रोजेक्ट को अल्टरनेटिव इलेक्ट्रिसिटी जेनरेटिड ऑप रोड नाम दिया गया था। इसमें जितनी अधिक गाड़ियां सड़कों पर दौड़ेंगी उतनी ही बिजली तैयार होगी। इस प्रोजेक्ट के लिए 2012 में भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और टी रामा स्वामीनाथन ने सम्मानित किया था। सरकार ने इस प्रोजेक्ट की सराहना भी की थी लेकिन आर्थिक मजबूरी के चलते अमित इसे प्रयोगात्मक रूप से करके नहीं दिखा पाया। इसके चलते सरकार ने भी इसे नजरअंदाज कर दिया।
सरकार को आइडिया सुझाना था मकसद
अमित ने अमर उजाला से बातचीत में बताया कि अगर केंद्र या प्रदेश सरकार आगे आए तो वह अपना प्रोजेक्ट देने को तैयार है। अमित ने बताया कि वॉल्वो बस में इलेक्ट्रानिक उपकरण भी डीजल से चलते हैं जबकि इस बस में अगर इलेक्ट्रानिक उपकरण चलाने हैं तो ही बस डीजल से चलानी होगी। उस समय भी इलेक्ट्रानिक उपकरण डीजल की बजाय सोर ऊर्जा से चलेंगे और बस ही केवल डीजल से चलेगी। अगर इलेक्ट्रानिक उपकरण नहीं चलाए जाते हैं तो फिर बस को सौर ऊर्जा से चलाया जा सकता है। अमित का कहना है कि पहल आइडिया तो सरकार ने नजरअंदाज कर दिया लेकिन सरकार एक दफा इस पर जरूर गौर फरमाए।