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कैटवॉक के दौरान भिड़े सांड, मची भगदड़ हि

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अमर उजाला ब्यूरो
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झज्जर।
कैटवॉक के दौरान पशुपालन विभाग के द्वारा कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। जिसका परिणाम ये रहा कि रैंप पर पहले जाने के लिए पशुपालकों के बीच होड़ सी लगी हुई थी। इस सब के बीच दो सांड भिड़ गए। गनीमत ये रही कि इन दोनों को पशुपालकों ने ही स्वयं कुछ देर में संभाल लिया। पशुपालन विभाग की ओर से तो इसके कोई पुख्ता प्रबंध नहीं थे। लेकिन सांडों के भिड़ने के दौरान वहां मौजूद किसानों में भगदड़ मच गई। भगदड़ के चलते मेले में अव्यवस्था का आलम सा बन गया। अधिकारी सामने कैटवॉक का नजारा लेते रहे लेकिन मंच से एक बार भी पशुओं को संभालने का बात नहीं की गई। मतलब साफ था कि मेले में आए सभी लोगों को जान जोखिम में डालकर ही मेले का भ्रमण करना पड़ा।

हूटिंग हुई तो विधायक ने बीच में छोड़ा पड़ा भाषण
रेड कॉरपेट पर जब मेले में पशुुओं का कैटवॉक चल रहा था तो पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने बीच में रुकवाते हुए बहादुरगढ़ विधायक को आमंत्रित कर लिया। विधायक नरेश कौशिक ने मंच से बोलना शुरू ही किया था कि किसानों ने हूटिंग शुरू कर दी। जिसका नतीजा ये रहा कि विधायक ने किसानों का मिजाज समझते हुए भाषण बीच में ही खत्म कर दिया। अधिकारियों ने तुरंत बाद अधिकारियों ने कैटवॉक शुरू करवाकर किसानों को शांत किया। जिसके बाद पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने भीड़ को रोकने लिए दूसरा टोटका अपनाया। मेले में हर रोज निकाले जा रहे लक्की ड्रा को कार्यक्रम के अंत में निकालने की घोषणा कर दी। लेकिन भीड़ कैटवॉक खत्म होते कम हो गई। जिसका उदाहरण ये है कि लक्की ड्रा में निकली मिल्किंग मशीन को लेने वाले विजेता नहीं मिले। जिसके बाद एक अन्य पर्ची निकालकर नया विजेता घोषित करना पड़ा।
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कृषि मंत्री ने की आपत्तिजनक टिप्पणी
देसी नस्ल की गायों को प्रमोट करने के चक्कर में कृषिमंत्री ओपी धनखड़ अमेरिकन नस्ल के सांडों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी कर गए। जोकि वहां पर लगे कैमरों व कार्यक्रम की वीडियो बना रहे युवाओं के मोबाइल में कैद हो गई। धनखड़ की टिप्पणी को लेकर वहां पर मौजूद महिलाएं काफी असहज दिखी। हालांकि मंच पर कई महिला अधिकारी भी मौजूद थी, जिसके बावजूद भी मंत्री ने टिप्पणी करते ध्यान नहीं रखा।



किसान का आरोप, इलाज के अभाव में दम तोड़ गया उसका भैंसा
झज्जर।
हिसार जिले के गांव पुठ्ठी सामण निवासी राजनारायण पशु प्रदर्शनी में अपने साढे़ चार वर्ष के मुर्राह नस्ल के भैंसे के साथ पहुंचे थे। राजनारायण का भैंसा प्रदर्शनी के दूसरे दिन शनिवार सुबह करीब नौ बजे को दम तोड़ गया। राजनारायण उर्फ लीला का आरोप है कि उसके भैंसे की मौत के जिम्मेदार पशुपालन विभाग के अधिकारी हैं, जिन्होंने सही समय इलाज शुरू नहीं किया व पशुपालन विभाग के अधिकारियों के पास दवा व जांच के लिए कोई प्रबंध नहीं था।
लीला की जुबानी, उसके भैंसे की मौत की कहानी
मैं पूठ्ठी सामण गांव में अपनी भैंसों की डेयरी चलाता हूं, अपनी डेयरी में नस्ल सुधार के लिए मुर्राह नस्ल का भैंसा मैंने रखा हुआ था। पशु प्रदर्शनी की खबर तो मुझ तक पहुंची थी लेकिन धान कटाई में व्यस्त होने के चलते यहां आना नहीं चाहता था। 25 अक्तूबर को चिकित्सकों की टीम मेरे में खेत में पहुंची और मुझे झज्जर आने के लिए बाध्य किया। जिस पर मैं अपने भैंसे को लेकर झज्जर पहुंचा। 26 अक्तूबर की शाम को करीब चार बजे भैंसे की तबियत बिगड़ने लगी तो मैंने सोचा कि वह थक गया होगा। ज्यादा तबियत खराब लगी तो मैं चिकित्सा काउंटर पर गया तो वो लोग बोले कि आपके पास चिकित्सक आ जाएगा। लेकिन मेरे पास तीन घंटे तक कोई नहीं पहुंचा। मैं फिर से काउंटर पर गया तो एक चिकित्सक का मोबाइल नंबर मुझे दिया गया। मैंने चिकित्सक को फोन किया तो तीन-चार चिकित्सकों की टीम मेरे पास पहुंची। चिकित्सकों ने भैंसे को देखकर कुछ दवा लिख दी। मैंने टेस्ट करने को पूछा तो वे बोले कि यहां सुविधा नहीं है।
दवा के लिए मुझे कहा गया कि आप बाजार से लेकर आइए। मेरे पास वाहन नहीं था तो मैंने चिकित्सकों से ही बाइक दिलवाने की बात कही। जिसके बाद बाइक लेकर झज्जर बाजार में आया। दवा लेकर मेले में पहुंचा तो चिकित्सकों ने भैंसे को इंजेक्शन लगाए। इसके दो घंटे बाद भी जब हालत में सुधार नहीं आया तो चिकित्सकों ने फिर से दवा लिखी, जोकि मैं बाजार से लेकर आया। करीब 10 ग्लूकोज व इंजेक्शन लगाने के बाद चिकित्सक चले गए। रात के समय जब भैंसे की हालत बिगड़ने लगी तो मैं चिकित्सकों के पास फिर से गया। जहां पर चिकित्सकों ने कहा कि जो दवा देनी थी, वो दे दी है। मेले में टेस्ट की कोई व्यवस्था नहीं है। मैंने कहा कि कोई एंबुलेंस या गाड़ी मंगवादो मैं इसे हिसार ले जाऊंगा। लेकिन चिकित्सकों ने कोई प्रबंध नहीं करवाया। सुबह करीब 9 बजे मेरी आंखों के सामने ही मेरा भैंसा धड़ाम से जमीन पर गिरा व उसके मुंह से खून निकला। चिकित्सकों का एक दल मेरी सूचना पर दो घंटे बाद आया। एक सीनियर अधिकारी मेरी शिकायत पर चिकित्सकों को धमका रहे थे। मैंने दवा की पर्ची उन्हें दिखाई तो वे पर्ची साथ ले गए। पूरे मामले में मैंने मंत्री ओपी धनखड़ को शिकायत देनी चाही तो उन्होंने पशुपालन विभाग के अधिकारी को मेरी शिकायत दिलवा दी।
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वर्जन
पशुपालन विभाग के उपनिदेशक मनीष डबास का कहना है कि भैंसों की लड़ाई में उक्त किसान का भैंसा का घायल हुआ था। भैंसें को चिकित्सकों ने समय पर संभाल लिया था और दवा भी सरकारी तौर पर ही दी गई थी। किसान ने भैंसें को ज्यादा चून खिला दिया, जोकि मौत की वजह बना। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में ड्रिकिंग निमोनिया को मौत का कारण पाया गया है। किसान पशुपालन विभाग के चिकित्सकों पर गलत आरोप लगा रहा है।
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