बहादुरगढ़। शहर में कुछ समाजसेवी कार्यकर्ताओं द्वारा चलाई जा रही मोक्ष सेवा समिति मानवता के लिए मिसाल बनी हुई है। यह समिति अब तक 258 शवों का दाह संस्कार करने के बाद अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर चुकी है। इसके अलावा उक्त समिति 200 बेसहारा मंदबुद्धि लोगों को आश्रम का सहारा दे चुकी है। सड़क दुर्घटना, बीमारी व अन्य हादसों में कई बार ऐसे लोगों की मौत हो जाती है, जिनका कोई वारिस नहीं होता। बेशक किसी तरह इन शवों का दाह संस्कार तो हो जाता है, मगर तर्पण, अस्थियां विसर्जन सहित अन्य क्रियाएं रह जाती हैं। मगर बहादुरगढ़ की मोक्ष सेवा समिति ऐसे शवों का पूरी धार्मिक प्रक्रिया से दाह संस्कार करती है। न केवल दाह संस्कार बल्कि हरिद्वार कनखल, गढ़ मुक्तेश्वर में अस्थियां विसर्जित करती है। जींद के पिंड-पिंडारा गांव में तर्पण क्रिया भी पूरी करती है।
वर्ष 2011 से हुई शुरुआत
दरअसल, वर्ष 2011 में मोक्ष सेवा समिति का गठन हुआ था। रजिस्ट्रेशन के बाद 17 नवंबर 2011 को उनके पास पहला केस आया। उक्त शव के दाह संस्कार के लिए नगर परिषद ने अनुमति दे दी। समिति के प्रधान सुरेंद्र उर्फ रिंकू चुघ के मुताबिक, चार हिस्सों में बंटा वो शव क्षत-विक्षत था। एक बार तो घबराहट हुई, मगर उन्होंने खुद सरकारी अस्पताल के शवगृह से शव को निकाला और किराये की गाड़ी के जरिये शहर के रामबाग में ले जाकर उसका दाह संस्कार किया। बस तब से लेकर अब तक सेवा का यह सेवा जारी है। इन आठ वर्षों में समिति अब तक 258 शवों का दाह संस्कार करके उनकी अस्थियों को गंगा में विसर्जित कर चुकी है।
एंबुलेंस और शव वाहन सुविधा
सही वक्त पर एंबुलेंस की सुविधा न मिलने पर अक्सर घायल दम तोड़ देते हैं। इसलिए समिति ने पांच वर्ष पहले मोक्ष एंबुलेंस सर्विस की शुुरुआत की। यह एंबुलेंस सरकारी अस्पताल में मौजूद रहती है। घायलों को उनके घरों तक घटना स्थल से अस्पताल तक पहुंचाती है। समिति शहर में शव वाहन की सेवा भी शुरू कर चुकी है।
मंदबुद्धि लोगों को दिलाती है सहारा
इन कार्यों के अलावा समिति बेसहारा घूम रहे मंदबुद्धि लोगों की भी मदद कर रही है। अपने आठ साल के सफर में समिति 200 मंदबुद्धि लोगों को आश्रम का सहारा दे चुकी है। समिति के कार्यकर्ता सड़कों पर मिलने वाले इन लोगों का उपचार करवाते है, फिर पुलिस की मदद से उनके परिजनों तक पहुंचने का प्रयास करती है। परिजनों के न मिलने पर दिल्ली के पूंठ कला स्थित अपना घर व रोहतक के जनसेवा संस्थान में सकुशल पहुंचा देते हैं।
ऐसे आया ख्याल
समिति के प्रधान सुरेंद्र चुघ ने बताया कि दिल्ली रोड पर बस स्टैंड के नजदीक उनका कार्यालय है। बस स्टैंड के सामने रामबाग होने के कारण इसी रास्ते से बहुत से मृतक लोगों की अंतिम यात्रा गुजरती है। उन्होंने बताया कि एक दिन जब वह ऑफिस में बैठे थे तो सामने से एक शव यात्रा गुजरी। इसके बाद मन में ख्याल आया कि सड़क दुर्घटना व अन्य हादसों में मरने वाले लोगों में बहुत से लोग ऐसे भी होते होंगे, जिनका कोई वारिस न हो। उक्त लावारिस के दाह संस्कार और मोक्ष क्रिया कैसे पूरी होती होगी। उन्होंने साथ बैठे अपने मित्र सौरभ को यह बात बतलाई। तब एक ऐसी संस्था बनाने का निर्णय लिया जो इन लावारिस शवों का दाह संस्कार व अस्थियां विसर्जन करे। अन्य मित्रों ने भी इसे सहमति जता दी। देखते ही देखते दर्जन भर से अधिक लोग जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने समिति का रजिस्ट्रेशन करवा लिया। वर्तमान में वीरेंद्र वत्स, रिंकू सेतिया, कृष्ण लोहचब, रवींद्र राठी, मुकेश सैनी, सतपाल, बिजेंद्र, सचिन मित्तल आदि समिति से जुड़े हैं।