अमर उजाला ब्यूरो
बेरी। पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी महिलाएं, श्रद्धा एवं उल्लास के साथ कतार में लगकर मां भीमेश्वरी के किए। वहीं धार्मिक गीतों की स्वरलहरियों के बीच झूमते हुए भक्त मंदिर तक पहुंचे। कुछ ऐसा ही नजारा बुधवार को पांचवें नवरात्र पर बेरी स्थित मां भीमेश्वरी देवी मंदिर परिसर में देखने को मिला। सुबह साढ़े तीन बजे ही मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई। नवरात्रों के नौ दिनों में मां भीमेश्वरी देवी मंदिर में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। कस्बा सहित आसपास के गांवों ही नही दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग की भीड़ मां की इक झलक को पाने के लिए आतुर दिख रहे थे। अष्टमी के नजदीक आते ही बेरी की ओर जाने वाले मार्ग और कस्बे की गलियों में श्रद्धालुओं की कतारें लगनी शुरू हो गई हैं। देश के कई शहरों से भक्त मां भीमेश्वरी देवी की पूजा अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं।
सप्तमी और अष्टमी रहते है विशेष दिन
मां भीमेश्वरी देवी मेले में सप्तमी व अष्टमी के दिन देशभर से लाखों की श्रद्धालु पहुुंचते है। मेले में किसी प्रकार की अनहोनी घटना नही हो इसके लिए सुरक्षा के भी इंतजाम किए गए है। पूरे मेला परिसर सीसीटीवी कैमरे की निगरानी में है, यातायात व अन्य पहलुओं को लेकर भी किसी प्रकार की कोई परेशानी नही है। मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पार्किंग की अलग से व्यवस्था की गई है।
आज तैनात होगी अतिरिक्त फोर्स
मेले में सुरक्षा की कमान संभाल रहे बेरी थाना प्रभारी नरसिंह ने बताया कि वीरवार शाम से मेला परिसर में बाहर से बुलाई गई फोर्स की ड्यूटी लगा दी जाएगी। पुलिस के जवान सादी वर्दी में भी मेले परिसर में तैनात रहेंगे। मेले में दूर-दराज राज्यों से आने वाले श्रद्वालुओं को किसी प्रकार की कोई परेशानी का सामना नही करना पड़ेगा।
पुलिस ने की अपील
बेरी थाना प्रभारी नरसिंह ने मेले में आने वाले पशु व्यापारियों से अपील की है कि वे आमजन व्यक्ति से ज्यादा तालमेल न रखे। किसी से कोई खान-पान की चीज वस्तु नहीं ले। मेले परिसर में पुलिस की ओर से पीसीआर तथा अन्य स्टाफ की भी तैनाती की गई है। व्यापारियों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो। इसके व्यापक इंतजाम किए गए है। फिर भी किसी को कोई समस्या होती है तो वह कंट्रोल रूम में संपर्क कर सकते हैं।
गधों और खच्चरों का लगता है मेला
बेरी वाली देवी के साथ-साथ गधों का सबसे बड़ा पशु मेला भी यहा पर लगता है। इसमें खास तौर पर प्रजापति लोग अपने-अपने गधों व खच्चरों को सजा कर लाते है। गधों को विभिन्न रंगों से सजाया जाता है। बढ़ते मशीनीकरण के कारण गधों का प्रचलन काफी कम हो गया है। मेले में हर वर्ष हजारों गधे, घोड़े और खच्चर खरीदे व बेचे जाते है, जिनकी कीमत हजारों से शुरू होकर लाखों में होती है।