सामान्य अस्पताल को अब तक नहीं मिली डायलिसिस की मशीन
अमर उजाला ब्यूरो
झज्जर। डायलिसिस के रोगियों के लिए सामान्य अस्पताल में तीन साल से डायलिसिस सेंटर के शुरू होने का इंतजार किया जा रहा है लेकिन अभी तक मशीनें नहीं आई हैं। विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सामान्य अस्पताल में इसके लिए अलग से यूनिट भी तैयार कर दी गई, जिस पर फिलहाल ताला लटक रहा है। डायलिसिस की सुविधा के विभाग के द्वारा पीपीपी मोड में टाईअप किया गया था लेकिन दिल्ली की कंपनी के द्वारा यहां पर सेटअप नहीं लगाया गया है। हालांकि कंपनी अधिकारियों के द्वारा अस्पताल की विजिट इस दौरान काफी बार की जा चुकी है लेकिन कार्य शुरू नहीं किया गया है। जिसके चलते यहां के मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है।
मरीजों को जाना पड़ता है रोहतक, गुरुग्राम और दिल्ली
झज्जर जिले के मधुमेह व किडनी से संबंधित बीमारियों से पीड़ित मरीजों को डायलिसिस के लिए रोहतक, गुरुग्राम और दिल्ली जाना पड़ता है। ऐसे में मरीजों का खर्चा भी बढ़ जाता है। वहीं निजी अस्पताल में एक बार डायलिसिस करवाने के लिए साढे़ 3 से 10 हजार रुपये तक की फीस वसूली जाती है। अगर बीमारी गंभीर स्टेज पर है तो महीने में चार बार भी डायलिसिस करवाना पड़ जाता है। ऐसे में समझा जा सकता है कि झज्जर के लोगों को डायलिसिस करवाना कितना महंगा पड़ रहा है।
क्यों पड़ती है डायलिसिस की आवश्यकता
जब किडनी की कार्यक्षमता कमजोर हो जाती है, शरीर से विषैले पदार्थ पूरी तरह नहीं निकल पाते, क्रिएटिनिन और यूरिया जैसे पदार्थों की अधिकता होने पर कई प्रकार की समस्याएं बढ़ जाती हैं तो ऐसे में मशीनों की सहायता से रक्त को साफ करने की प्रक्रिया को डायलिसिस कहते हैं। क्रॉनिक रिनल डिजीज या क्रॉनिक किडनी डिजीज के कारण क्रिएटिनिन क्लियरेंस रेट 15 फीसदी या उससे भी कम हो जाए तो डायलिसिस करना पड़ता है। किडनी की समस्या के कारण शरीर में पानी इकटा होने लगे यानी फ्लूइड ओवरलोड की समस्या हो जाए। पहले दवा देकर देखा जाता है, फायदा न मिलने पर डायलिसिस करना पड़ता है। अगर शरीर में पोटेशियम की मात्रा बढ़ जाए और दिल की धड़कनें अनियमित हो जाएं तो अलग-अलग तरह की दवाएं दी जाती हैं। दवाओं का असर न दिखे तो डायलिसिस की सलाह दी जाती है।
दो प्रकार का होता है डायलिसिस
-हीमोडायलिसिस
यह एक प्रक्रिया है। जिसे कई चरणों में संपन्न करना पड़ता है। इस प्रक्रिया में शरीर से विशेष प्रकार की मशीन द्वारा एक बार में 250 से 300 मिलीलीटर रक्त को बाहर निकालकर शुद्ध किया जाता है और वापस शरीर में डाला जाता है। इस शुद्धीकरण के लिए डायलाइज नामक चलनी का प्रयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया केवल अस्पताल में ही की जाती है।
-पेरिटोनियल डायलिसिस
इस डायलिसिस में रोगी की नाभि के नीचे ऑपरेशन के माध्यम से एक नलिका लगाई जाती है। इस नलिका के जरिए एक प्रकार ंका तरल (पीडी फ्लूइड) पेट में प्रवेश क राया जाता है। पेट के अंदर की झिल्ली डायलाइजर का काम करती है जो पीडी फ्लूइड के अच्छे पदार्थोे को शरीर में प्रवेश कराती है और रक्त में मौजूद विषैले पदार्थों को बाहर निकालती है। यह तरल पेट में 5-6 घंटे तक रखना पड़ता है। इसके बाद नलिका के माध्यम से पीडी फ्लूइड को बाहर निकाला जाता है। यह आजकल प्रचलन में काफी ज्यादा है। यह उपचार उन लोगों का होता है जो या तो बेहद कम उम्र या ज्यादा आयु के होते हैं, विज्ञान की भाषा में इसे एक्सट्रीम ऑफ एजेस कहते हैं। जिन लोगों को ह्वदय संबंधी समस्या हो या ऐसे लोग जो हीमो डायलिसिस प्रक्रिया को सहन न कर पाए उनके लिए उपचार का यह तरीका काफी उपयोगी होता है।
वर्जन
निजी कंपनी के साथ पीपीपी मोड़ में टाईअप किया गया था लेकिन मशीनें नहीं पहुंची हैं। जिसके चलते सामान्य अस्पताल में डायलिसिस की सुविधा शुरू नहीं हो पाई है। डायलिसिस सेंटर के लिए विभाग के उच्चाधिकारियों को अवगत करवाया जाएगा।
संजय सचदेवा, एसएमओ, सामान्य अस्पताल झज्जर।