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‘संपति नारायण स्मृति, विपदा नारायण विस्मृति’

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झज्जर। जैतपुर गांव में आचार्य गौरव दीक्षित राधे-राधे महाराज के मुखारविंद से चल रही सप्त दिवसीय भागवत कथा के सातवें दिन बुधवार को सुदामा चरित्र, व्यास पूजन एवं यज्ञ के साथ विदाई समारोह किया गया। व्यास पीठासीन आचार्य गौरव दीक्षित ने सप्तम दिवस की कथा करते हुए भगवान के प्रिय मित्र सुदामा महाराज के चरित्र का मार्मिक वर्णन किया और कहा कि सुदामा जी महाराज ने जीवन में सर्वोपरि अगर किसी धन को माना है तो वह नारायण रूपी धन को माना है। सुदामा जी महाराज कहते थे - ‘‘संपत्ति नारायण स्मृति, विपदा नारायण विस्मृति’’ सुदामा जी कहते थे जीवन अगर कोई संपत्ति है तो नारायण का ध्यान हुआ करता है और अगर कोई सबसे बड़ी विपत्ति है तो वह भगवान को भूल जाना हुआ करती है। आचार्य गौरव दीक्षित ने बताया हनुमान जी महाराज ने भी जीवन में सबसे बड़ी संपत्ति भगवान के ध्यान को बताया और सबसे बड़ी विपत्ति भगवान को भूल जाना। रामचरितमानस में वर्णन आया है - ‘‘कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई, जप तप सुमिरन भजन न होई’’ इसी सूत्र को मानने वाले सुदामा जी महाराज ने भगवान कृष्ण को सर्वस्व मानते हुए अपने जीवन का यापन किया। सुशीला के कहने पर भगवान कृष्ण से भेंट करने के लिए सुदामा चले और उपहार स्वरूप सुशीला ने चार मुट्ठी चावल की टुकड़ी रखते हुए भगवान से अपने मन की व्यथा कही। जब सुदामा जी महाराज द्वारका में पहुंचे और भगवान कृष्ण को पता चला तो सर्वस्व छोड़कर नंगे पैर ही अपने मित्र सुदामा को लेकर अपने भवन में आते हैं और सिंहासन पर बैठा कर अपने नेत्रों की अश्रुधारा से अपने प्रिय मित्र सुदामा के चरणों का प्रक्षालन करते हुए भक्तवत्सल होने का उदाहरण देते हैं। आचार्य गौरव दीक्षित ने सुदामा चरित्र के बाद भगवान कृष्ण के स्वधाम की कथा, दत्तात्रेय के 24 गुरुओं की कथा करते हुए सुखदेव जी पूजन, परीक्षित मोक्ष की कथा एवं पूर्णाहुति के साथ सप्त दिवसीय कथा को विश्राम दिया।
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