दीपक, रिसर्च स्कॉलर। डॉ. मनोज दयाल।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पिछले कुछ समय से भारतीय कुश्ती संघ राजनीतिक कारणों से सुर्खियों में है, जोकि नहीं होना चाहिए। खिलाड़ियों, राजनेताओं और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया को इस विषय में संवेदनशील होना चाहिए। राजनेताओं को अनर्गल बयानबाजी से बचना चाहिए और खिलाड़ियों को अपने खेल अभ्यास की तरफ केंद्रित होना चाहिए। 2011 में बृज भूषण सिंह ने भारतीय कुश्ती संघ का चुनाव जीता। 2019 में वह निर्विरोध कुश्ती संघ के अध्यक्ष बने। कुश्ती संघ ने कुछ ऐसे फैसले लिए, जिससे खिलाड़ी काफी नाराज हो गए।
कुछ गैर-सरकारी संगठन अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत चुनिंदा पहलवानों को मदद करने लगे। इसके अच्छे नतीजे भी मिले, क्योंकि अब खिलाड़ी विदेशों में रह कर उन्हीं पहलवानों के साथ ट्रेनिंग करने लगे, जिनके साथ उनको टूर्नामेंट्स में भिड़ना होता था। इससे पहलवानों की झिझक भी कम हुई और विदेशों में बेहतर सुविधाओं के कारण उनका प्रदर्शन एक अच्छे स्तर पर रहने लगा।
इधर सरकार ने भी टॉप स्कीम के जरिये खिलाड़ियों की मदद करनी शुरू की, लेकिन भारतीय कुश्ती महासंघ को गैर-सरकारी संगठनों का पहलवानों के साथ डायरेक्ट कॉन्ट्रैक्ट रास नहीं आया। रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया ने 2022 में इस तरह की सारी मदद पर रोक लगा दी।
इसके बाद पहलवानों को मिलने वाली सुविधाएं जैसे मनपसंद विदेशी कोच, फिजियो और विदेशों में ट्रेनिंग भी बंद हो गई। दूसरी तरफ से देखें तो भारतीय कुश्ती संघ ने कुछ फैसले ऐसे भी किए जो कुश्ती के भविष्य के लिए अच्छे हो सकते थे। एक नियम लागू किया गया, जिसके तहत नेशनल चैंपियनशिप में एक राज्य केवल एक ही टीम भेज सकेगा।
इससे हरियाणा के खिलाड़ियों की शिरकत अब कम हो गई। इस कारण हरियाणा की कुश्ती लॉबी कुश्ती महासंघ के खिलाफ हो गई। फेडरेशन ने उभरते खिलाड़ियों को पूरा मौका दिया। सोनम मालिक का टोक्यो ओलंपिक के लिए चयन हुआ। सोनम ने साक्षी मालिक जैसी बड़ी खिलाड़ी को लगातार तीन बार मात देकर भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई।
अंशु मलिक को भी कुश्ती संघ ने आगे आने का मौका दिया। कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह पर कई तरह के आरोप 2022 में लगाए गए। उसके बाद कुश्ती एक राजनीतिक मुद्दा बन गया था, तमाम राजनीतिक दल इसमें कूद पड़े थे। हाल ही में कुश्ती संघ के दोबारा चुनाव हुए और उसमें बृज भूषण शरण सिंह के करीबी संजय सिंह नए अध्यक्ष चुनने गए। उसके बाद बजरंग पुनिया ने अपना पद्मश्री का सम्मान सरकार को लौटने का फैसला किया और साक्षी मालिक ने कुश्ती से संन्यास लेने का एलान कर दिया।
इसके बाद केंद्रीय खेल मंत्रालय ने कुश्ती संघ की नव-निर्वाचित कार्यकारिणी को निलंबित कर दिया है। संक्षेप में कहना चाहूंगा कि यह सब दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा नहीं होना चाहिए, यदि कोई दोषी है तो उसे कानून सजा देगा। खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। उनको पूरा मान-सम्मान मिलना चाहिए और उनकी जायज मांग मानी जानी चाहिए।
:- विचार दीपक, रिसर्च स्कॉलर, पत्रकारिता विभाग सीडीएलयू, सिरसा
विशेषज्ञ की राय
युवाओं में लेखन क्षमता बढ़ाने का अमर उजाला का यह प्रयास अत्यंत ही सराहनीय कदम है। आज जहां मौलिक चिंतन एवं मौलिक लेखन के क्षेत्र में सुखाड़ की स्थिति है। तो ऐसे में युवाओं को प्रोत्साहन देना न केवल आवश्यक है, बल्कि पत्रकारिता जगत के लिए एक अपरिहार्य मुद्दा है। किसी भी खेल खासकर कुश्ती जैसी गतिविधियों में सियासी हस्तक्षेप न केवल अस्वास्थ्यकर है, बल्कि नकारात्मक भी है। राजनेताओं की अवांछित बयानबाजी से न केवल खिलाड़ी हतोत्साहित होते हैं, बल्कि नैराश्य की गहन कालिमा में डूब जाते हैं, और अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। खेलकूद और खासकर कुश्ती युवाओं में एक स्वास्थ्यकर प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न करता है। उनमें अंतिम क्षण तक संघर्ष करने का उत्साह बना रहता है। उस प्रकार की भावना व उत्साह उनके व्यवहारिक जीवन में भी अत्यंत कारगर सिद्ध होता है।
- डॉ. मनोज दयाल, डीन, मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान विभाग एवं निदेशक, अब्दुल कलाम प्राचीन भारतीय विज्ञान केंद्र, जीजेयू हिसार
यह भी जानें
भारत में प्राचीन समय में कुश्ती को ''''मल्ल-युद्ध'''' यानी हाथों से मुकाबला के नाम से जाना जाता था। कुश्ती से जुड़ी कई कहानियां रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन महाकाव्यों में भी मिलती है। जहां एक ओर हमें रामायण में हनुमान व अंगद के बल का उल्लेख मिलता है। वहीं दूसरी ओर महाभारत में पांडव पुत्र भीम को सबसे बलशाली व्यक्ति माना जाता था। कुश्ती की मांग बढ़ते हुए देखकर वर्ष 1948 में भारत में भारतीय कुश्ती संघ की स्थापना की गई। स्वतंत्र भारत को कुश्ती में पहला पदक केडी जाधव ने 1952 में हेलसिंकी ओलंपिक में कांस्य पदक के रूप में जीता था। वहीं महिला पहलवानों में 2016 के रियो ओलंपिक में साक्षी मलिक ने कुश्ती में पहला पदक कांस्य के रूप में जीता था।
पिछले दिनों चुनाव के तहत भारतीय कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष ब्रजभूषण सिंह के करीबी संजय अध्यक्ष बनें। शाम तक कुश्ती खिलाड़ियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें महिला खिलाड़ी साक्षी मालिक ने जूते मेज पर रख संन्यास का एलान किया। केंद्र सरकार ने नवनिर्वाचित कुश्ती की कार्यकारिणी कमेटी को भंग कर दिया।
यकीन कुमार, छात्र - मास कम्यूनिकेशन, जीजेयू
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सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि खेल को सियासत से दूर रखना चाहिए : यकीन कुमार
भारत ने कुश्ती में दुनिया में नाम कमाया है। लेकिन जिस तरह से कुश्ती का दौर चल रहा है यह काफी निंदनीय है। आरोप कुश्ती खिलाड़ियों पर भी लगता रहा है कि विपक्ष की ओर से खिलाड़ियों को गुमराह किया जा रहा है या खिलाड़ी विपक्ष के कहने पर आरोप लगा रहे हैं। गौंडा जिले से सांसद और पूर्व अध्यक्ष ब्रजभूषण सिंह शरण के संघ के नतीजों के बाद ये कहना कि दबदबा तो है, दबदबा तो रहेगा इस बात की पुष्टि करता है कि कुश्ती संघ में सियासत कितनी हो रही है। खिलाड़ियों का दिल्ली में धरने पर बैठे रहना साल 2023 की अहम सुर्खियां रहीं। खिलाड़ियों का कांग्रेस के साथ मिलना या सांसद दीपेंद्र हुड्डा से बार-बार मुलाकात भी कुछ संकेत दे रहा है। जो कि किसी भी खेल में राजनीति का होना उस खेल की भावना को नुकसान पहुंचाता है। खिलाड़ियों का कहना है कि देश की बेटियों को सुरक्षित महसूस कराना संघ की जिम्मेदारी है। ये सही भी है। जब तक खिलाड़ी सुरक्षित महसूस नहीं करेंगी, तब तक कोई भी खिलाड़ी अपना उत्तम नही दे पाएगा। सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि खेल को सियासत से दूर रखना चाहिए, ताकि कोई खेल अपना सही रूप ले पाए। खिलाड़ियों को भी विपक्ष या फिर किसी भी संगठन से दूर रहकर अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि राजनेताओं का काम सियासत करना है, उन्हें जहां वोट बैंक नजर आएगा, उनका झुकाव उसी तरफ होगा। इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों शामिल हैं। किंतु खिलाड़ियों का ये कहना कि एक महिला अध्यक्ष ही इस पद को सही से संभाल पाएगी ये सही नही है, क्योंकि एक जिम्मेदार पुरुष अध्यक्ष भी अपनी जिम्मेदारी संभालने में कामयाब हो सकता है। वहीं एक गैर-जिम्मेदार महिला अध्यक्ष भी शायद अपनी जिम्मेदारी न संभाल पाए।
- सुनीता, कीर्ति नगर, भिवानी
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संघ के अध्यक्ष को गैर-राजनीतिक होना आवश्यक: सुनीता
कुश्ती भारतीय परंपरा का प्रतीक है जो उत्तर भारत में सदियों से खेली जा रही है। इस खेल में भारतीय पहलवानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाया है। भारतीय कुश्ती संघ ने इन पहलवानों की ट्रेनिंग और प्रबंधन के लिए गठन किया है, जिससे सुनिश्चित होता है कि पहलवानों को उनकी क्षमता के अनुसार मौका मिले और खेल की गुणवत्ता बढ़े। यह संघ योग्य पहलवानों को प्रोत्साहित करता है, ताकि भारतीय कुश्ती का स्तर निरंतर उच्च रहे। इस उद्देश्य के लिए कुश्ती संघ का निष्पक्ष होना आवश्यक है। इसके लिए संघ के अध्यक्ष को निर्वाचित किया जाता है और उसकी कार्यकाल की अवधि सीमित होती है। हालांकि, हाल के कुछ समय से भारतीय कुश्ती संघ की कार्यप्रणाली में कुछ सवाल उठे हैं, जिनमें महिला पहलवानों द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप सबसे गंभीर है। संघ में सियासी प्रभाव के कारण न्याय की प्रक्रिया धीमी हो जाती है और संघ के चाल चरित्र पर प्रश्न उत्पन्न होता है। इससे लिंग भेद की समस्या और भेदभाव बढ़ता है और कुश्ती का स्तर कम होता है। इस परिस्थिति में, संघ के अध्यक्ष को गैर-राजनीतिक होना आवश्यक है और संघ को स्वायत्त मिले, ताकि सरकार पर संघ की निर्भरता कम हो। अंत में, संघ का सुचारु नियोजन केवल पहलवानों को नहीं बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए भी सहायक होगा।
राजेश कुमार, गांव दिनोद, भिवानी
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खिलाड़ी को स्कूल स्तर से ही राजनीति का शिकार होना पड़ता: राजेश कुमार
हमारे देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है हमारी जनसंख्या दुनिया के सभी देशों से ज्यादा है। पर जब विश्व स्तरीय खेल प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं, तो हमें बड़ी मुश्किल से एक स्वर्ण पदक मिलता है। पदक तालिका में हमारा स्थान नीचे ढूंढ़ने पर ही मिलता है और काफी शर्म महसूस होती है। हमारा स्थान उन देशों से भी नीचे है जो बहुत गरीब देश माने जाते हैं और हमारी गिनती हम महा शक्तियों में करते हैं। देश की खेल नीति की इस हालत की जिम्मेदार कई कारण हो सकते हैं। पर इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार राजनीति है। जातिवाद ने और भी आग में घी डालने का काम किया है। खेलों के साथ राजनीति ने इस तरह खिलवाड़ किया है, जिसका खामियाजा देश के खिलाड़ियों, उनके अभिभावक-प्रशिक्षकों और पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है। कुश्ती संघ के सर्वोच्च पद पर बैठा नेता गोल्ड मेडल को 15 रुपये का बोलता है। उसे उसी समय जेल में होना चाहिए था। वैसे तो हर खिलाड़ी को स्कूल स्तर से ही राजनीति का शिकार होना पड़ता है। पर अब इस गंदी राजनीति ने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत कर गौरव बढ़ाने वाली देश की पहलवान बेटियों का भी यौन शोषण करके सड़कों पर घसीटवा दिया था। तब हर भारतीय को जो राजनीति व जातिवाद से दूर हैं उनको ये सब याद आया कैसे हमारे पहलवानों ने अच्छे खेल से मेडल जीते और पोडियम पर तिरंगा ओढ़ कर खड़े हुए। हमारे राष्ट्रगान की धुन बजी थी और अब उन्हीं खिलाड़ियों को अपने जूते मेज पर रखकर संन्यास लेकर खेल सम्मान लौटाने पर मजबूर होना पड़ा है। कुश्ती संघ का चुनाव जीतने वाला राजनेता दबदबा है दबदबा रहेगा ये हमारे देश के माथे पर कलंक के समान है। हमारे देश में जितने भी खेल बोर्ड हैं उनमें राजनेता व उनके परिवार वाले सांप की तरह कुंडली मारे बैठे हुए हैं। भले ही उन्हें उस खेल की जानकारी शून्य हो। वहीं खेल नीति बनाते हैं। उसे खिलाड़ियों की जरूरतों व समस्याओं की कोई जानकारी नही होती है। उनके द्वारा लिए फैसले ही खेल नियम बन जाते हैं। खिलाड़ी अगर आवाज उठाता है, उसे अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। और एक खिलाड़ी जिसने देश का गौरव बढ़ाया है या बढ़ाने का सपना देखा था उसका खेल खत्म कर दिया जाता है। अगर हमें देश के खेलों और खिलाड़ियों की हालत सुधारनी है तो सबसे पहले राजनीति को खेल से निकालना होगा। जितने भी राजनेता खेल मंत्रालय खेल बोर्डों में बैठे हुए हैं उनको बाहर करके उसी खेल के उन खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को ही बोर्ड के पदों पर बैठाना चाहिए, जिन्होंने उस खेल में अच्छा प्रदर्शन किया है। चुनाव प्रक्रिया में सियासत का दखल बिल्कुल बंद होना चाहिए तभी देश की खेल नीति सुधर सकती है। खिलाड़ियों की इज्जत सर्वोपरी होनी चाहिए। इससे हमारे देश के खिलाड़ी अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसा प्रदर्शन कर पाएंगे। फिर मेडल तालिका में देश का नाम नीचे के बजाय ऊपर से देख सकेंगे।
नरेश कुमार सैनी, श्याम नगर, हिसार
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दोनों पक्ष अपने आप को सही साबित करने में लगे: नरेश कुमार सैनी
भारत में खेलों को बड़े सम्मान के साथ खेला जाता है। खिलाड़ियों को देश में नायक समझा जाता है। खेल हमारी संस्कृति का एक अहम हिस्सा समझा जाता है। जिस प्रकार हमें हमारी संस्कृति हमें विरासत में मिली है। उसी प्रकार खेल भी हमें हमारी विरासत के रूप में प्राप्त हुए हैं। आधुनिक युग में भी भारत में ऐसे बहुत से खेल हैं जो प्राचीन समय से खेले जाते रहे हैं। उनमें से एक है कुश्ती। भारत में कुश्ती को भारत की मिट्टी का खेल कहा गया है। इस खेल में भारतीय पहलवानों का स्वर्णिम काल रहा है। सन 1952 के दादा साहेब जाधव से लेकर 2021 में रवि कुमार दहिया तक बहुत से पहलवानों ने देश को गौरवान्वित किया है। मगर वर्तमान समय में देश में कुश्ती संघ और पहलवानों के बीच जो मतभेद चल रहा है। उससे खिलाड़ियों और देशवासियों को शर्मिंदा कर दिया है। यहां पर दोनों पक्ष अपने आप को सही साबित करने में लगे हैं। जिस कारण खेल व खिलाड़ियों पर इसका असर पड़ना लाजमी है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि राजनीति से जुड़े लोगों को खेलों से दूर रहना चाहिए। ताकि खेल राजनीति का अखाड़ा न बनने पाए। और खेल संघ में सिर्फ खिलाड़ियों या उस खेल से जुड़े लोगों को ही रखा जाए। खेलों में देश को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी चाहिए न कि खिलाड़ी के नाम को। इससे खेलों में पारदर्शिता आएगी। साथ ही सही खिलाड़ी अपनी क्षमता के अनुसार खेल में प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकेगा। अगर राजनीति शामिल होगी तो खिलाड़ियों को अपनी क्षमता साबित करने की चुनौतियों से गुजरने में कमी आएगी। इससे खेल की गरिमा और देश की साख दोनों धूमिल है। अत: खेलों से राजनीति को दूर ही रखना चाहिए। ताकि देश में बेहतर खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले।
- प्रीति, कुलाना, हिसार
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बृजभूषण शरण पर लगे आरोपों का मामला अदालत में पहुंचना चाहिए था : प्रीति
2023 में हमारे देश के बहुत से मामलों ने जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इन्हीं में से एक हरियाणा में कुश्ती में छीड़ी बहस है। हाल ही में हुए कुश्ती चुनावों को भंग कर दिया गया है। जिसके लिए पहलवानों ने प्रदर्शन भी किया था। बृजभूषण शरण पर लगे आरोपों का मामला अदालत में पहुंचना चाहिए था। जिसके कारण यह मामला सही से निपटाया जा सकता था। लेकिन कई तरीके से यह राजनीति तक पहुंच गया। इससे यह खेल जगत के मामले से सियासी जंग में बदल गया। एक ओर तो सरकार खेलों को बढ़ावा दे रही है। लड़कियों के खेलों को भी प्रोत्साहन भी दे रही है। लेकिन ऐसे मामलों को देखते हुए खेल के प्रति काफी उदासीन प्रतिक्रिया लोगों द्वारा व्यक्त की जाती है। आमतौर पर तब जब ऐसे मामलों की या तो सुनवाई नहीं होती या उनकी बातों का पहाड़ बना दिया जाता है। अगर ऐसे मामलों पर सही से सबूतों व पीड़ितों की गवाही पर निपटाए जाते तो बेहतर होता। क्योंकि राजनीति में ऐसे मामलों को ले जाना गलत है। इसमें सही या गलत कोई भी हो, लेकिन इनपर सियासी जंग छेड़ना इस मामले का हल नहीं है। पहलवानों का कहना है कि महिला पहलवानों के लिए महिला अध्यक्ष होनी चाहिए तो सरकार को भी इस बात पर ध्यान देना चाहिए। बृजभूषण शरण पर लगे आरोपों के आधार पर विपक्षी दल का भाजपा पर आरोप लगाना सही नहीं है, वो भी इसलिए कि बृजभूषण शरण भाजपा से संबंध रखते हैं। बिना एक-दूसरे पर आरोप लगाए ऐसे मामलों को शांति, समझदारी व जल्दी से सुलझाया जाए तो भविष्य में ऐसे मामले कम होने की उम्मीद होती है।
- पवन कुमार, सातरोड़
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सियासत को हमेशा कुश्ती से अलग रखना चाहिए: पवन कुमार
कुश्ती और सियासत दोनों अलग-अलग चीजें होती हैं। कुश्ती हो या कोई और खेल, सियासत हो तो वह उन खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर लगा देता है। जिनकी सियासत में पहुंच नहीं हो पाती है। इससे उस खेल में खिलाड़ियों का मनोबल कम होता है और समय से पूर्व ही सन्यास ले लेते हैं। जो कि खेल और देश दोनों के लिए हानिकारक होता है। इसका एक अच्छा उदाहरण श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड का है। सरकार ने बोर्ड को भंग करके एक अलग समिति बना दी है। इसके फलस्वरूप अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने श्रीलंका से अंडर-19 की मेजबानी छीनकर दूसरे देश को दे दी है। जो कि एक देश के लिए अच्छा नहीं होता। ऐसा एक उदाहरण कुश्ती का है। यहां पर कुश्ती संघ के चुनाव न होने पर विश्व कुश्ती संघ ने भारतीय कुश्ती संघ को निलंबित कर दिया। इसकी वजह से भारतीय खिलाड़ियों को तिरंगा लेने की अनुमति नहीं दी गई। जो एक अपमान जैसा था। ये कुछ उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि कुश्ती में सियासत कितनी हानिकारक हो सकती है। ये उदाहरण साबित करते हैं कि सियासत को हमेशा कुश्ती से अलग रखना चाहिए।
- प्रियंका सौरभ, आर्यनगर
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कुश्ती को सियासत ने बहुत नुकसान पहुंचाया : प्रियंका सौरभ
पिछले लगभग एक साल के भारतीय कुश्ती को सियासत ने बहुत नुकसान पहुंचाया है। कुश्ती संघ के अध्यक्ष पर महिला पहलवानों के आरोप लगने के बाद से ही सरकार को उन्हें हटा देना चाहिए था, किंतु सियासत के चलते ऐसा नही हुआ। इसका दुष्परिणाम यह है कि आज अभिभावक कुश्ती या अन्य खेल में अपनी बेटी का भेजते कई बार सोचेंगे। देश में अभिभावक पहले ही अपनी बेटी की सुरक्षा और सम्मान को लेकर चिंतित रहते हैं, इस प्रकरण ने उनकी चिंता और बढ़ाई है। अब वे बेटी को खेल विशेषकर कुश्ती में भेजते हुए हजार बार सोंचेंगे। हाल ही में सरकार ने नए चुनाव का भले ही रद्द कर दिया हो किंतु लंबे समय से कुश्ती संघ में दबदबा कायम रखने वाले राजनीतिज्ञ चुप बैठने वाले नहीं हैं। वे सरकार के इस निर्णय के विरूद्ध कोर्ट जांएगे। इनका प्रयास होगा कि कुश्ती संघ की सियासत उनके हाथ से न जाने पाए। भले ही सरकार ने नए चुनाव को रद्द करके यह संदेश देने का प्रयास किया है कि कुश्ती संघ को नियमों का पालन करना होगा। लेकिन खेल संघ से राजनैतिक लोगों को दूर रखने के लिए सरकार को काम करना चाहिए। खिलाड़ी भी यदि राजनीति में आ जाए तो उसे भी खेल संघ से बाहर ही रखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी खेल संघों में राजनैतिक दखल को लेकर चिंता जता चुका है और इसे कतई जायज नहीं ठहराता। खेल संघों में खिलाड़ी होने चाहिए। वे खेल और खिलाड़ी को ज्यादा समझते हैं, राजनेता नहीं। सियासत के चलते बेपटरी हुए कुश्ती संघ को पटरी पर लाने उसमें खिलाड़ियों और पहलवानों का विश्वास जमाने को बहुत कुछ करना होगा। संघ में खिलाड़ी लाने होंगे। शुभ संकेत होगा कि कुश्ती संघ की गरिमा बचाने और बेटी की सुरक्षा की चिंता करते परिवारजनों को आश्वस्त करने के लिए कुश्ती संघ का अध्यक्ष किसी महिला खिलाड़ी को बनाए।
- डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा
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देश को मेडल दिलाने वाले इंसाफ की गुहार लगा रहे : डॉ. सत्यवान सौरभ (बड़वा)
वर्तमान कुश्ती संघ और सियासती विवाद से दुनिया भर में भारत की बदनामी हो रही है। यह खेलों पर एक बदनुमा दाग, शर्म का विषय और त्रासदी है। देश के जो खिलाड़ी विदेशी सरजमीं पर तिरंगे का मान बढ़ाते आए, उन्हें अपने अधिकारों के लिए जंतर- मंतर पर धरना देना पड़ रहा है। क्या ऐसे देश खेलों में आगे बढ़ेगा। देश को मेडल दिलाने वाले इंसाफ की गुहार लगा रहे हैं। पहलवान कुश्ती महासंघ से दो-दो हाथ करने उतरे हैं। आखिर इस खेल और सियासी लड़ाई का अंजाम क्या होगा। किसकी सरकार है या किसकी थी, ये मुद्दा नहीं है। सवाल ये है कि क्या महिला खिलाडियों के साथ यौन शोषण होता है, या फिर ये सियासी मामला है। मुद्दा महिला खिलाड़ियों की सम्मान व मानसिक, शारीरिक सुरक्षा का है। अगर कुश्ती में बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई तो महिला खिलाड़ियों में हर खेल के प्रति रुझान खत्म हो जाएगा। उनका मनोबल गिर जाएगा। महिलाओं की खेलों में भागीदारी कम हो जाएगी। देश की प्रतिष्ठा और महिला खिलाड़ियों की अस्मिता का सवाल है। क्या राजनीति के चलते दम तोड़ जाती हैं प्रतिभाएं। खेलों में राजनीति के सक्रिय होने से प्रतिभावान खिलाड़ियों को दबाया जाता है। खिलाड़ी हमेशा खेल अधिकारियों के दबाव में रहते हैं। खेलों में मेहनत करने वालों की प्रतिभाएं दबकर रह जाती हैं और आवाज उठाने पर खत्म कर दिया जाता है। यदि हां तो ऐसे संघों पर राजनेता नहीं, खेल प्रतिभाओं को विराजमान करना चाहिए। इन संस्थाओं में पदाधिकारियों का कार्यकाल भी निश्चित होना चाहिए व एक टर्म से ज्यादा किसी को भी पद-भार नहीं दिया जाना चाहिए। सरकार की बंदिशों के बावजूद अधिकांश खेल संघों पर राजनेताओं का कब्जा है। इनमें बड़ा भ्रष्टाचार व्याप्त है, जो वास्तविक खेल प्रतिभाओं को आगे नहीं आने देती। यह सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न फेडरेशन के अंदर कारगर तंत्र बनाने पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।