प्रियंका सौरभ का कहना है कि दल-बदल कानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके। 1985 से पहले दल-बदल के खिलाफ कोई कानून नहीं था। उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा खूब प्रचलित था। दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद 'आया राम गया राम' प्रचलित हो गया। लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके खिलाफ विधेयक लेकर आई।
1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई। ये संविधान में 52वां संशोधन था। इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई। इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी खत्म हो सकती है। अगर कोई विधायक या सांसद खुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के खिलाफ जाता है। अगर कोई सदस्य पार्टी व्हिप के बावजूद वोट नहीं करता। अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है। विधायक या सांसद बनने के बाद खुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल कानून में आता है।
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता खत्म नहीं होगी। वर्ष 2003 में इस कानून में संशोधन भी किया गया। जब ये कानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी पार्टी में बंटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी।
लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फायदा उठाया जा रहा है। इसलिए ये प्रावधान खत्म कर दिया गया। इसके बाद संविधान में 91वां संशोधन जोड़ा गया। जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया।
विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गंवाने से बच सकते हैं। अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी। ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं।
स्पीकर को ये अधिकार नहीं है, कि वो सदन की बची हुई अवधि तक बागी विधायकों की सदस्यता निरस्त कर दे। यानी अयोग्य ठहराते वक्त स्पीकर को ये अधिकार नहीं होगा कि वो बागी विधायकों के विधानसभा के बचे हुए कार्यकाल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दें।
ऐसे में कुछ महीनों में दोबारा चुनाव कराए जाते है। इसमें बागी हुए विधायक भी सत्ताधारी पार्टी के टिकट से लड़ते है और कई जीत भी जाते हैं। तो ऐसे में दल बदल कानून अब बेमानी होता लगता है। इस से दल बदल आसान हो गया है। कानून में संशोधन कर ये प्रावधान किया जाना चाहिए कि दल बदल करने वाला विधायक पूरे पांच साल के टर्म में चुनाव नहीं लड़ सकता। या फिर वो अविश्वास प्रस्ताव में वोट देंगे तो वोट काउंट नहीं किया जाएगा। दल-बदल कानून के दायरे से बचने के लिए विधायक या सांसद इस्तीफा दे रहे हैं।
लेकिन ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए कि जिस पीरियड के लिए वो चुने गए थे, अगर उससे पहले उन्होंने स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया, तो उन्हें उस वक्त तक चुनाव नहीं लड़ने दिया जाएगा। देशव्यापी कोई बहुत बड़ी वजह हो, आदर्शों की बात है या कोई बहुत उसूलों की बात है। तब तो ठीक है, लेकिन बिना वजह त्याग पत्र देने के बाद अगला चुनाव आप फिर से लड़ रहे हैं। तो ये तकनीकी तौर पर तो सही है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये सारे लोग कानून में बारूदी सुरंग लगा रहे हैं। किसी भी कानून को तोड़ने वाले उसका तरीका निकाल लेते हैं, यहां जो तोड़ निकाला गया है, उसे रिसॉर्ट संस्कृति का नाम दिया जा रहा है।