हिसार। थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से आनुवंशिक तौर पर मिलने वाला रक्त रोग है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है। इस वजह से खून की कमी हो जाती है। इस रोग की पहचान तीन माह की आयु के बाद होती है। खून की काफी कमी से रोगी बच्चे को बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इस रोग से पीड़ितों की जान बचाने में जुटे हैं हमारे शहर के वेद झंडई। आज विश्व थैलेसीमिया दिवस है। इसी को लेकर हमने वेद झंडई से बात की।
हिसार थैलेसीमिया सोसायटी के अध्यक्ष वेद झंडई बताते हैं कि उनके दो बच्चों की इस बीमारी से मौत हो गई थी, जिनमें एक लड़का व एक लड़की थी। इसके बाद वर्ष 1988 में उन्होंने यह संस्था बनाई और तब से वह थैलेसीमिया के मरीजों की मदद में जुटे हुए हैं। खून उपलब्ध कराने से लेकर कोई भी अन्य मदद की जरूरत हो तो वह करते हैं। वेद झंडई के अनुसार इस बीमारी को रोकने के लिए दो उपाय हैं। पहला शादी के समय वर-वधू दोनों की रक्त जांच करवाएं और दूसरा गर्भावस्था के समय इसकी जांच करवाएं।
बेटे के जन्मदिवस पर हर साल लगाते हैं रक्तदान शिविर
वेद झंडई बताते हैं कि उनके बेटे का जन्मदिवस 26 जून को आता है। वह 1995 से हर साल इस दिन रक्तदान शिविर लगाते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले काफी कम लोग रक्तदान करते थे। अब लोगों में जागरूकता आई है। वह बताते हैं कि उनके पास दिल्ली, राजस्थान सहित अन्य राज्यों और जिलों के लोग भी मदद के लिए आते हैं। वह कहते हैं कि हम उन लोगों की हर संभव मदद करते हैं। हिसार थैलेसीमिया सोसायटी में 11 सक्रिय पदाधिकारी हैं। बाकी वे लोग भी सोसायटी से जुड़े हैं, जिनकी उन्होंने मदद की है।
सोसायटी चलाएगी जागरूकता अभियान
हिसार थैलेसीमिया सोसायटी इस रोग से बचाव के लिए जागरूकता अभियान भी चलाएगी। इस अभियान के तहत शहर के कॉलेजों में पढ़ रहे युवाओं को थैलेसीमिया जांच कराने के लिए प्रेरित किया जाएगा। हालांकि अभी कोरोना की वजह से अभियान वृहद स्तर पर नहीं चलाया जाएगा। इस जांच के आधार पर माइनर थैलेसीमिया पीड़ित मिलने वाले युवाओं का डाटा एकत्रित किया जाएगा। साथ ही माइनर थैलेसीमिया मिलने वाले युवाओं के अभिभावकों को इस बारे में जागरूक किया जाएगा कि अपने बेटा या बेटी की शादी के समय उसके साथी की थैलेसीमिया जांच अवश्य कराएं, ताकि एक माइनर थैलेसीमिया वाले की दूसरे माइनर थैलेसीमिया वाले के साथ शादी न हो सके और इस बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सके।
जिले में थैलेसीमिया के 60 मरीज
वर्तमान में जिले में थैलेसीमिया के करीब 60 मरीज हैं। इनमें एक साल से लेकर 34 साल के युवा भी शामिल है। 34 साल के मरीज को एक माह में चार दफा खून की जरूरत होती है।
ऐसे होता है यह रोग
चिकित्सकों के मुताबिक पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींस में अगर माइनर थैलेसीमिया है तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया होने की आशंका रहती है। यह काफी घातक हो सकता है। अगर माता-पिता में से किसी एक में माइनर थैलेसीमिया है तो खतरा कम रहता है।