हिसार। पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया हत्याकांड में दोषी सोनिया और संजीव को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से मिली अंतरिम जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट में वीरवार को करीब दो घंटे सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ के समक्ष प्रदेश सरकार की ओर से सरकारी वकील ने कैदियों की समयपूर्व रिहाई से संबंधित वर्ष 2000 से अब तक बनाई गई सभी नीतियों का ब्योरा रखा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछली सुनवाई में सरकार से इन नीतियों का रिकॉर्ड उपलब्ध कराने को कहा था।
इससे पहले 11 अगस्त को हुई सुनवाई में याचिकाकर्ताओं की ओर से लोकेश सिंघल, मुक्ता गुप्ता, अधिवक्ता आइना वर्मा खोवाल और लाल बहादुर खोवाल ने पक्ष रखा था। उन्होंने कहा था कि यह जघन्य हत्याकांड है और दुर्लभतम मामलों में शामिल है। दोषियों को सुप्रीम कोर्ट ने भी फांसी की सजा सुनाई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदला गया। ऐसे दोषियों को रिहा करना उचित नहीं होगा।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नौ दिसंबर 2025 के फैसले में सोनिया और संजीव को अंतरिम जमानत दी थी। इसके खिलाफ रेलूराम के भतीजे जितेंद्र व अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। याचिका में हाईकोर्ट की आपराधिक रिट याचिका संख्या 10858/2024 के फैसले को चुनौती दी गई है।
क्या है मामला
अगस्त 2001 में लितानी गांव स्थित फार्म हाउस में पूर्व विधायक रेलूराम पूनिया (50), उनकी पत्नी कृष्णा देवी (41), पुत्र सुनील (23), बहू शकुंतला (20), पुत्री प्रियंका (14), पोता लोकेश (4) और पोतियों शिवानी (2) व 45 दिन की प्रीति की हत्या हुई थी। मई 2004 में हिसार की अदालत ने सोनिया और संजीव को फांसी की सजा सुनाई थी। वर्ष 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सजा बरकरार रखी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।