15 बाई 9 की बैरक के अंदर ही था पाखाना
रामस्वरूप ने बताया करीब ढाई से तीन महीने हमें हिसार जेल में रखा गया। 15 बाई 9 की बैरक के अंदर करीब 20 लोगों को रखा जाता था। अंदर ही पाखाना था तो पेशाब करने के लिए एक घड़ा रखा होता था। पाखाने को साफ करने के लिए कोई नहीं आता था और अंदर बदबू फैली रहती थी। सभी को कुछ समय के लिए बैरक से निकाला जाता था फिर अंदर डाल दिया जाता था। हर रात एक साल सी लगती थी। हिसार से पकड़े गए 45 से ज्यादा लोगों के अलावा इस जेल में सिरसा, फतेहाबाद, भिवानी आदि जगह के बंदियों को भी बंद किया गया था।
पिता की यातना के बारे में सोचकर पकड़ा गया
रामस्वरूप पोपली ने बताया हम हिसार बाद में आए, मूल रूप से हांसी निवासी थे और लाल सड़क पर हमारा घर था। बजरिया चौक अब प्रताप चौक पर पिताजी के साथ कपड़े की दुकान पर बैठता था। 19 साल की उम्र में शादी हो गई थी। आपातकाल के वक्त बेटा प्रवीण करीब पांच साल का था। आपातकाल लागू होने के बाद हम छिपते फिर रहे थे, लेकिन पता चला कि निहाल चंद चावला नामक संघ सेवक के फरार होने पर उनके बुजुर्ग माता-पिता पकड़ लिया गया। जिन्हें प्रताड़ित भी किया गया। तब मुझे बुजुर्ग पिता का ख्याल आया। मां का साथ बचपन में ही छूट गया था। परिवार यातनाएं न झेले इसलिए मैं पकड़ा गया।
22 महीनों तक झेली प्रताड़ना
रामस्वरूप ने बताया आपातकाल 21 महीनों के लिए था लेकिन हम इसके बाद भी प्रताड़ना झेलते रहे। तीन महीने के बाद जमानत मिली तो पेशी पर बुलाया जाता था। पेशी पर जाने के दौरान कपड़ा और रुपयों की मांग की जाती थी। इमरजेंसी खत्म होने के बाद भी दबाव बनाया जाता रहा और यातनाएं झेलते रहे। जेल में हमारे साथ देश के कई बड़े चेहरे थे। जेल में रहते हुए ही नेताओं ने चुनाव लड़े और जीते भी थे। आपातकाल में पकड़े लोगों को सरकार की तरफ से ताम्र पत्र दिया गया और उनको सरकार की तरफ से पेंशन भी दी जा रही है।