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Hisar News: उम्र का बंधन टूटा... बच्चों के साथ बुजुर्ग सीख रहे गुरुमुखी, मॉडल टाउन गुरुद्वारे में भाषा सीखने की अनूठी मुहिम

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हिसार। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि किसी भी समाज की संस्कृति, परंपरा और पहचान की सबसे बड़ी धरोहर होती है। जब नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होने लगती है तो सांस्कृतिक जड़ें भी कमजोर पड़ जाती हैं। इसी सोच के साथ मॉडल टाउन स्थित गुरुद्वारे में दस वर्षों से निशुल्क गुरुमुखी सिखाने की मुहिम जारी है। गुरुद्वारा प्रधान दलविंदर सिंह ने बताया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य लोगों को पंजाबी भाषा के प्रति जागरूक करना और आने वाली पीढ़ियों को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित कराना है।
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कक्षाओं की संयोजक हरजीत कौर ने बताया कि इस शिक्षण सत्र की शुरुआत 25 मई से हुई है जो 18 जून तक चलेगी। प्रतिदिन शाम 4 से 5:30 बजे तक आयोजित होने वाली कक्षा में करीब 30 लोग नियमित रूप से आ रहे हैं। जीत सिंह बांगा ने बताया कि इन कक्षाओं में उम्र का कोई बंधन नहीं है। 8 वर्ष के बच्चों से लेकर 60 वर्ष तक के बुजुर्ग एक साथ बैठकर गुरुमुखी सीख रहे हैं। कुछ बच्चे अपनी माताओं के साथ सहपाठी बनकर आ रहे हैं।
पंजाबी गाने सुनते हैं पर शब्दों के मायने नहीं जानते
अभियान से जुड़े अमितजीत सिंह और दतार सिंह ने युवाओं के बीच भाषा के गिरते स्तर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी पंजाबी गाने तो बहुत शौक से सुनती है लेकिन वे उनमें इस्तेमाल होने वाले शब्दों के सही अर्थ तक नहीं जानते। युवा सोशल मीडिया ट्रेंड्स के पीछे भागते हुए अपनी मूल भाषा को पीछे छोड़ रहे हैं। अन्य भाषाओं का ज्ञान होना जरूरी है लेकिन अपनी मां-बोली और संस्कारों को भूल जाना कतई उचित नहीं है।
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स्कूलों में पंजाबी भाषा को बढ़ावा देने की जरूरत
राजकीय मॉडल संस्कृति स्कूल नलवा में कार्यरत पंजाबी शिक्षक गौरव भूटानी ने बताया कि नलवा गांव में एक भी पंजाबी परिवार नहीं रहता इसके बावजूद स्कूल में पंजाबी भाषा पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 100 से अधिक है। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे अपने बच्चों के स्कूलों में प्रबंधन के समक्ष पंजाबी विषय पढ़ाए जाने की मांग उठाएं ताकि बच्चे बचपन से ही अपनी जड़ों से जुड़ सकें।
पढ़ने के साथ-साथ लिखने और बोलने पर फोकस
शिक्षिका परमजीत कौर और निर्मल चावला ने बताया कि भाषा में दक्षता केवल पढ़ने से नहीं बल्कि निरंतर अभ्यास से आती है। इसीलिए कक्षाओं में मौखिक और लिखित दोनों प्रकार का अभ्यास करवाया जा रहा है ताकि प्रतिभागियों का आत्मविश्वास बढ़े। उन्होंने बताया कि अंग्रेजी आज के समय की जरूरत है और उसे जरूर सीखना चाहिए लेकिन उसके साथ अपनी क्षेत्रीय और मातृभाषा को भी समान महत्व मिलना चाहिए। 10 वर्षों से निरंतर चल रही अनूठी पहल अब हिसार में मातृभाषा संरक्षण का प्रभावी अभियान बन चुकी है।
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