हिसार। आज से करीब आठ दशक पहले भारत से पाकिस्तान बना। धर्म आधारित राज्य घोषित होने के कारण हिंदुओं समेत कई अल्पसंख्यक समुदायों को पाकिस्तान छोड़कर भारत आना पड़ा। इस दौरान उन्हें कई प्रकार के जुल्म सहने पड़े। इसके लिए उन्हें बहुत कुछ खोना पड़ा।
इस विभाजन विभीषिका से लाखों लोग प्रभावित हुए। परंतु बहुत कुछ लोगों ने अपने आप को फिर से खड़ा किया। एक सराफा कारोबारी परिवार ने यहां आकर कृषि यंत्र बनाने शुरू किए तो किसी ने वहां हथकर का काम छोड़कर यहां स्कूल खोल दिया। पाकिस्तान से हिसार आए शरणार्थी और उनके परिजनों से बातचीत की तो उनका कहना है कि उस समय का मंजर भयानक था। सभी परिजनों को सुरक्षित शरणस्थली की तलाश थी।
आज भी जब विभाजन के समय की बात होती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस समय वहां के हालात नाजुक थे। किसी तरह जान बचाकर यहां पहुंचे। जब मैं आया तो मेरी उम्र मात्र डेढ़ साल थी। अपने चाचा और परिवार के सदस्यों के साथ पटेल नगर के शरणार्थी शिविर में आया। फिर गांव दौलतपुर में घर खरीदा। 12 से 13 साल तक गांव में समय बिताया। पिता भगत राम नारायण खड्डी वाले हथकर का काम करते थे। उनके साथ काम में हाथ बंटाया। कभी पेट्रोप पंप पर काम किया तो कभी कहीं मजदूरी की। फिर 1965 में हिसार आ गए। यहां बीए और बीएड किया। फिर बाल विद्या निकेतन स्कूल खोला। 15-20 साल तक स्कूल चलाया। आज भी स्कूल चल रहा है, लेकिन मैंने स्कूल छोड़ दिया है।
- राजेंद्र सिंह, महता नगर निवासी
-
विस्थापन में जब पिता पूर्ण चंद हिसार आए थे तो उनकी उम्र 19 साल थी। अब पाकिस्तान तब के भारत में वहां खुद की जमीन थी। सोना-चांदी का व्यापार था। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। अच्छा काम चल रहा था। मगर जब विभाजन हुआ तो वहां मारकाट शुरू हो गई। भयानक मंजर था। आंखों के सामने सब कुछ खोना पड़ा। किसी तरह जान बचाकर यहां पहुंचे। यहां फिर नए जीवन की शुरुआत हुई। शुरुआत में काफी दिक्कतें आई। धीरे-धीरे व्यापार शुरू किया। पिता ने खुद की दुकान खरीदी और कृषि यंत्र बनाने का काम शुरू किया।
- सुभाष मल्होत्रा, सेक्टर-13 निवासी
देश की आजादी से एक दिन पहले मिले विभाजन के दंश को कभी भुलाया नहीं जा सकता। मेरे पिता, माता व परिजन बताते थे कि विभाजन विभीषिका के दौरान बड़ा खूनी खेल खेेला गया। चारों तरफ तबाही का मंजर था। किसी तरह जान बचाते हुए यहां पहुंचकर अपने कारोबार में लगे। यहां जान बचाकर पहुंचे लोगों के मन में अपनों व अपना कारोबार खोने की टीस थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और देश व धर्म का साथ देते हुए आजाद भारत में रहते हुए मेहनत करके अपनी जीविका फिर से शुरू की। मेरे पिता व कई अन्य जानकार परिवार समय की विभाजन की जीवंत तस्वीरें जब बयां करते थे तो सुनकर भी रूह कांप उठती थी।
- राजेंद्र सपड़ा, भाजपा मीडिया प्रमुख
हिसार। सुभाष मल्होत्रा।
हिसार। सुभाष मल्होत्रा।