हरियाणा के हिसार जिले के गांव भगाना के शक्ति सिंह पाकिस्तान के खिलाफ कारगिल की जंग में बहादुरी से डटे रहे। शक्ति सिंह ने जांघ व पेट में गोली लगने पर भी 48 घंटे तक दुश्मनों पर गोलियां दागते रहे। उनकी रेजीमेंट ने काफी दुश्मनों को मौत के घाट उतारा था। रिटायर हो चुके शक्ति सिंह के दाएं पैर में आज भी दुश्मन की गोलियों के तीन निशान हैं।
वे बेशक जंग में 90 फीसदी दिव्यांग हो गए, मगर दिव्यांगता उनकी बहादुरी का स्वयं बखान कर देती है। शक्ति सिंह ने बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति की तरफ से 15 जनवरी 2000 को एक कमांडर ने उनको जम्मू में गैलेंट्री अवॉर्ड से सम्मानित किया था। उनकी बहादुरी के लिए राष्ट्रपति ने उनको सेना मेडल से सम्मानित किया। जब उन्हें मेडल मिला तो सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।
भगाना गांव के बहादुर बेटे शक्ति सिंह ने बताया कि 19 साल की उम्र में 21 सितंबर 1987 को सेना में भर्ती हुए थे। वर्ष 1999 में जम्मू-कश्मीर के बारामूला में 18 ग्रनेडियर रेजीमेंट में नायक के पद पर तैनात थे। तब आला अधिकारियों ने रेजीमेंट के सैनिकों को आदेश दिया कि टाइगर और तोलोलिंग हिल पर पाकिस्तान के सैनिक आ गए हैं। उनको वहां से भगाना है।
सैनिकों ने तोलोलिंग हिल पर चढ़ाई शुरू कर दी थी। वहां दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। हमारे सैनिकों ने दुश्मन को भगाकर काफी हद तक तोलोलिंग हिल पर कब्जा कर लिया था। उसके बाद नीचे उतरने का आदेश हुआ और वहां सेकंड राज राइफल रेजीमेंट के जवानों को तैनात किया गया। उन सैनिकों ने तमाम दुश्मनों का सफाया किया था। अधिकारियों के आदेश पर हमने 2 जुलाई 1999 को टाइगर हिल पर चढ़ाई की थी। संवाद
ऑपरेशन से एक टांग डेढ़ इंच छोटी हो गई
शक्ति सिंह ने बताया कि दुश्मन काफी ऊंचाई पर बैठा था। हमें भी काफी चढ़ाई करनी थी। सेना के अधिकारियों ने सैनिकों को तीन ग्रुप में बांटकर तीन तरफ से दुश्मनों को घेरने का आदेश दिया। हम तीन ग्रुप में अलग-अलग तरफ से आगे बढ़ने लगे। दुश्मनों से नजर बचाकर ऊपर चढ़ने में कामयाब रहे। वहां हमने दो बंकरों पर कब्जा जमाए बैठे चार घुसपैठियों को ढेर किया था। इस दौरान दूर बैठे दुश्मनों की गोलीबारी में शक्ति सिंह घायल हो गए थे।
उनके हाथ और जांघ व पेट में गोलियां लगी थी। 48 घंटे तक शक्ति सिंह दुश्मनों पर गोली दागते रहे। शक्ति सिंह 4 जुलाई 1999 को सिपाही सुखबीर सिंह की मदद से पहाड़ी से नीचे उतरने में सफल रहे थे। शक्ति सिह बताते हैं कि उसके बाद जम्मू के सैनिक अस्पताल के बाद दिल्ली के अस्पताल में दाखिल कराया गया था। छह जुलाई 1999 से अप्रैल 2000 तक अस्पताल में दाखिल रहे थे। उपचार के दौरान उनकी टांग काटने की नौबत आ गई थी, मगर डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर टांग बचा ली। ऑपरेशन के कारण टांग डेढ़ इंच छोटी हो गई।
सेना मेडल मिलने पर गर्व से सीना हो गया चौड़ा
शक्ति सिंह ने बताया कि तत्कालीन राष्ट्रपति की तरफ से 15 जनवरी 2000 को एक कमांडर ने उनको जम्मू में गैलेंट्री अवॉर्ड से सम्मानित किया था। शक्ति सिंह ने बताया कि उनकी बहादुरी के लिए राष्ट्रपति ने उनको सेना मेडल से सम्मानित किया। जब उन्हें मेडल मिला तो सीना गर्व से चौड़ा हो गया। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
पारिवारिक स्थिति
शक्ति सिंह ने बताया कि उनका जन्म 10 सितंबर 1968 को गांव भगाना में किसान जिले सिंह के घर हुआ था। उनकी बड़ी बहन कामजीत बाबल हिसार में सिविल अस्पताल के नर्सिंग स्कूल की प्रिंसिपल हैं और छोटे भाई राजेश वकील हैं। उनकी पत्नी स्नेहलता सातरोड़ गांव की पीएसची में नर्स हैं। उनकी बेटी स्वीटी पंघाल एमबीबीएस कर रही है और बेटा शुभम पंघाल बीटेक की पढ़ाई कर रहा है।