शहर की सबसे प्रमुख राजगुरु मार्केट में लॉकडाउन के बाद खासी चहल-पहल बढ़ गई है। मार्केट सामान्य दिनों में हर रोज 10 हजार से ज्यादा ग्राहकों से गुलजार होती है। कोरोना के दौर में भी ग्राहकों की कमी नहीं है। यहां बेसमेंट सहित लगभग 400 दुकानें बनी हैं, जिनमें सबसे बड़ा काम कपड़े का है। कपड़े के होलसेल का कारोबार भी यहीं से संचालित होता है।
कोरोना से बचाव के लिए दुकानदार अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। हर दुकान में सैनिटाइजर रखा है तो सामाजिक दूरी का भी पूरा पालन करवाने की कोशिश हो रही है। राजगुरु मार्केट वर्ष 1949 में बसाई गई थी। शुरुआत में यहां करीब 100 दुकानें थीं, मगर आपातकाल के समय में बंसीलाल की सरकार में यहां बने मलेरिया विभाग के दफ्तर की जमीन पर दुकानें काटकर इस मार्केट को विस्तार दिया गया था।
400 में से 100 से ज्यादा दुकानें होलसेल की
राजगुरु मार्केट की इन 400 में से 100 से ज्यादा होलसेल की दुकानें हैं। यहां सबसे अधिक कपड़ा दिल्ली से आता है। इसके अलावा गुजरात के सूरत, अहमदाबाद, राजस्थान के भीलवाड़ा के अलावा मुंबई से भी माल आता है। ग्राहकों की बात करें तो हिसार के अलावा फतेहाबाद, सिरसा, भिवानी, जींद जैसे जिलों के साथ राजस्थान के हनुमानगढ़ व गंगानगर जिले तक से भी ग्राहक इस मार्केट से कपड़ा खरीदने पहुंचते हैं।
खुद का अनाउंसमेंट सिस्टम
इतने बड़े बाजार में दुकानदारों या ग्राहकों तक कोई भी संदेश पहुंचाने के लिए राजगुरु मार्केट वेलफेयर एसोसिएशन ने अनाउंसमेंट सिस्टम लगाया हुआ है। कोई भी सामान या त्योहारी सीजन में बच्चों के गुम होने पर अनाउंसमेंट कर दी जाती है, जिससे सामान या खोया हुआ बच्चा तुरंत मिल जाता है।
पार्किंग व्यवस्था खुद संभालती है एसोसिएशन
खास बात यह है कि मार्केट में वाहनों की व्यवस्था बनाने के लिए पार्किंग सिस्टम खुद राजगुरु मार्केट वेलफेयर एसोसिएशन संभालती है। दोपहिया से लेकर चौपहिया वाहनों को तरतीब से लगवाने के लिए एसोसिएशन ने कर्मचारी लगा रखे हैं।
40 साल तक मेहरचंद गांधी रहे प्रधान
राजगुरु मार्केट के दुकानदारों में आपसी भाईचारा भी खूब है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वेलफेयर एसोसिएशन की कमान 40 साल तक एक ही दुकानदार मेहरचंद गांधी के हाथ में रही। जब तक वह जीवित रहे, उन्हें ही प्रधान चुना जाता रहा। मेहरचंद गांधी के बाद सदानंद कामरा, फिर महेश चौधरी बने और अब गौतम नारंग प्रधान हैं।
मेरे पिता रामधन चौधरी 1950 में यहां आए थे। उस समय मात्र पांच रुपये दुकान का किराया होता था। जो लोग मलेरिया विभाग के दफ्तर के आगे खोखा लगाते थे, उन्हें दुकानें अलॉट कर दी गई थीं। मैं खुद 40 साल से दुकान संभाल रहा हूं। नागौरी गेट से ही दिल्ली के लिए बसें मिलती थीं।
- महेश चौधरी, पूर्व प्रधान, राजगुरु मार्केट वेलफेयर एसोसिएशन
राजगुरु मार्केट के दुकानदारों में आपसी भाईचारा है। वेलफेयर एसोसिएशन मिलकर सामूहिक फैसले लेती है। जब भी कोई समस्या मार्केट में आती है, तो उसे मिल-बैठकर सुलझा लेते हैं। कोरोना न फैले, इसके लिए भी दुकानदारों को पर्याप्त प्रबंध करने के लिए समझा दिया गया है।
- गौतम नारंग, प्रधान, राजगुरु मार्केट वेलफेयर एसोसिएशन