जिला नागरिक अस्पताल में ऑक्सीजन खपत प्रतिदिन 240 सिलिंडर तक हो गई है। यह बढ़ोतरी 10 दिनों में देखने को मिली है। अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में मरीजों की लगातार संख्या बढ़ रही है। ज्यादातर मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट और वेंटिलेटर पर उपचाराधीन हैं। इससे पहले अस्पताल में अधिकतम में 120 सिलिंडर तक खपत थी।
सिलिंडर भरवाने के लिए अस्पताल के सात कर्मचारियों की टीम को हर समय मौजूद रहना पड़ता है। जो दिनरात गाड़ी में लोड कर भरवाकर लाने में रहते हैं, ताकि मरीज को उनकी जिंदगी की सांस मिल सके। ऐसे में एक चक्कर में एक साथ करीब 40 से 50 सिलिंडरों को सेक्टर 27-28 स्थित गुप्ता ऑक्सीजन प्लांट से भरवाकर लाया जाता है। अस्पताल के ऑक्सीजन रूम कंट्रोलर मनोज कुमार से मिली जानकारी के अनुसार इस समय एक बार में पाइप से 12 सिलिंडरों को जोड़ा जाता है, साथ ही ऑक्सीजन प्लांट की पाइप लाइन भी जुड़ी होती है। इनको मिलाकर प्रति मिनट के हिसाब से 120 लीटर ऑक्सीजन पाइपलाइन से छोड़ी जा रही है।
प्लांट की पाइप लाइन से ऑक्सीजन छोड़ने पर बजता है अलार्म
इंजीनियर के मुताबिक जब आइसोलेशन वार्ड में ऑक्सीजन पाइप से ऑक्सीजन छोड़ते हैं तो प्लांट की पाइप लाइन के साथ सिलिंडर को जोड़ा जाता है। वरना प्लांट की ऑक्सीजन पाइप से 1 मिनट भी सीधी ऑक्सीजन की सप्लाई नहीं छोड़ी जाती, क्योंकि क्षण भर में ही प्लांट का अलार्म बजने लगता है। इस वजह से प्लांट को बंद पड़ता है। यह ऑक्सीजन प्लांट सामान्य तौर पर कामयाब है।
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प्लांट की क्षमता से 6 से 7 गुना अधिक सप्लाई होती है
इस ऑक्सीजन प्लांट की हर रोज की उत्पादन क्षमता 30 से 35 ऑक्सीजन सिलेंडर तक है। यह प्लांट प्रति मिनट के हिसाब से 175 से 200 लीटर तक ऑक्सीजन बनाता है। मगर इस समय अस्पताल में पाइप लाइन से प्रति मिनट में 1200 लीटर तक ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है। ऐसे में प्लांट की क्षमता के 6 से 7 गुना अधिक सप्लाई होती है, जिस कारण लोड अधिक हो जाता है।
सिलिंडरों के लाने व ले जाने से फर्श और मैट की हालत खस्ता
हर समय सिलिंडरों को लाने व ले जाने के कारण आइसोलेशन वार्ड के मेन गेट पर बना फर्श पूरी तरह से टूट गया है। यहां तक की फर्श पर बिछाने वाला मैट भी खस्ता हालत में था। पहले यह मैट 6 महीनों में खरीदना पड़ता था, लेकिन अब सप्ताह भर भी नहीं चल पाता है। ऐसे में ऑक्सीजन कंट्रोल रूम का गेट बाहरी और करने की बेेहद जरूरत है।