हिसार। बॉन्ड पॉलिसी के खिलाफ एमबीबीएस विद्यार्थियों की तरफ से चलाए जा रहे आंदोलन का आईएमए ने सोमवार को सुबह आठ से लेकर रात आठ बजे तक ओपीडी बंद कर समर्थन किया है। निजी अस्पतालों में ओपीडी बंद होने से मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ी। वहीं इसका असर नागरिक अस्पताल की ओपीडी पर दिखाई दिया। वहां पर सामान्य दिनों के बजाय सोमवार को मरीजों की संख्या ज्यादा दिखाई दी। आईएमए प्रधान डॉ. जेपी नलवा ने कहा कि अगर, सरकार ने बॉन्ड पॉलिसी वापस नहीं ली तो वे सीएम मनोहर लाल की गाड़ी के सामने लेट जाएंगे। आईएमए ने कहा कि जरूरत पड़ी तो डॉक्टर भी सड़कों पर उतर आएंगे। सोमवार को करीब 125 निजी अस्पतालों में ओपीडी बंद रही।
इधर से उधर भटकते रहे मरीज
आईएमए के फैसले पर बॉन्ड पॉलिसी के खिलाफ सोमवार को निजी अस्पतालों में चिकित्सकों ने अपनी-अपनी ओपीडी सुबह से लेकर रात 8 बजे तक बंद रखी। जिस कारण निजी अस्पतलों में दवा लेने आने वाले मरीजों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाने पड़े। थक हार कर मरीज वापस अपने घर चले गए। बहबलपुर गांव से आई युवती रेणू ने बताया कि वह अपनी मां को जोड़े के दर्द की दवा दिलवाने के लिए शहर के एक निजी अस्पताल में आई थी। सुबह दस बजे अस्पताल पहुंचने के बाद पता चला कि अस्पताल में चिकित्सक हड़ताल पर हैं। ऐसे में वापस गांव जाना पड़ा। अब मंगलवार को दोबारा से अस्पताल लाना पड़ेगा।
बच्चे डॉक्टर बनना छोड़ देंगे
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के प्रधान डॉ. जेपी नलवा ने प्रेसवार्ता के दौरान सरकार की बॉन्ड पॉलिसी केे गलत ठहराया है। उन्होंने कहा कि एक नवंबर से एमबीबीएस विद्यार्थी लगातार पॉलिसी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने इस और कोई ध्यान नहीं दिया। सरकार जो पॉलिसी लाई है उससे मध्यम और गरीब परिवार के बच्चों का चिकित्सक बनने का सपना टूट जाएगा। जिसके पास पैसा होगा वह अपने बच्चों के लिए मेडिकल की सीट खरीद लेगा।
एसोसिएशन सचिव संदीप कालरा ने बताया कि आईएमए इस पॉलिसी का विरोध करती है। विरोध स्वरूप सोमवार को ओपीडी बंद की है, अगर जरूरत पड़ी तो निजी अस्पतालों के चिकित्सक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगे। उन्होंने कहा कि वे एमबीबीएस विद्यार्थियों के साथ हैं। इस मौके पर डॉक्टर अजय महाजन, डॉ. राजीव अग्रवाल, डॉ. पूनम आदि मौजूद थे।
ओपीडी के बाहर लगी रही भीड़
निजी अस्पतालों में ओपीडी बंद होने से नागरिक अस्पताल की ओपीडी के बाहर मरीजों की भीड़ अधिक दिखाई दी। फिजिशियन, हड्डी रोग विशेषज्ञ, ईएनटी और नेत्र रोग विशेषज्ञ की ओपीडी के बाहर मरीजों की कतार लगी दिखाई दी। आज 900 के करीब मरीजों ने दवा ली।
देश में चिकित्सक की पढ़ाई सस्ती हो तो कौन अपने वतन को छोड़ पढ़ाई करने जाएगा विदेश
हिसार। विदेेश से एमबीबीएस कर रहे विद्यार्थी भी बॉन्ड पॉलिसी के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि अगर देश में चिकित्सक की पढ़ाई सस्ती हो तो कौन अपने वतन को छोड़कर पढ़ाई करने के लिए विदेश जाएगा। इस पर विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी राय दी है।
लाइेंसस लेना अनिवार्य
नागरिक अस्पताल परिसर में रहने वाली छात्रा खुशी ने बताया कि एमबीबीएस द्वितीय वर्ष के दूसरे सेमेस्टर में पढ़ रही हूं। यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के कारण ऑनलाइन पढ़ाई चल रही है। बॉन्ड पॉलिसी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि एमबीबीएस चयन होने पर विद्यार्थी को बॉन्ड के रूप में 40 से 45 लाख रुपये भरने होंगे। पांच साल पढ़ाई पूरी करने के बाद सात साल तक गांव के सरकारी अस्पताल में जॉब करनी होगी। उसके बाद जो बॉन्ड भरा हुआ है वह वापस मिलेगा। अगर, वह निजी अस्पताल में जॉब करता है या खुद का खोलता है तो उसे बॉन्ड वापस नहीं मिलेगा। उनका कहना है कि सरकार की इस पॉलिसी ने बच्चों का चिकित्सक बनने का सपना टूट जाएगा। उन्होंने बताया कि देश में एमबीबीएस की पढ़ाई सस्ती होती तो विदेश में क्यों पढ़ने जाते। बॉन्ड के अलावा सरकार ने नया नियम ये भी लागू किया है कि विदेश से एमबीबीएस की डिग्री लेने के बाद वहां पर एक साल प्रैक्टिस करनी होगी और लाइसेंस लेना होगा। अगर, किसी के पास लाइसेंस नहीं होता तो यहां पर वह अपना अस्पताल या निजी अस्पताल में जॉब नहीं कर सकता। उन्होंने सरकार से अपील की है कि वह इस पॉलिसी में बदलाव करें।
सरकार की बॉन्ड पॉलिसी गलत, बच्चों के भविष्य पर खतरा मंडराया
हिसार। जॉर्जिया से एमबीबीएस कर रही छात्रा अक्षिता ने बताया कि वह तृतीय वर्ष की में पढ़ रही है। आज सुबह ही यहां पर पहुंची हूं। पहले यूूक्रेन से एमबीबीएस कर रही थी। उन्होंने बताया कि देश में सरकार ने जो बॉन्ड पॉलिसी लागू की है वह गलत है। इस पॉलिसी से विद्यार्थी चिकित्सक नहीं बन पाएंगे। अभिभावक भी इतने रुपये एक साथ जमा नहीं करवा सकता। ऐसे में बड़े लोगों के ही बच्चे डॉक्टर बन पाएंगे। सरकार ने जो नए नियम लागू किए हैं उनके हिसाब से चिकित्सक बनने में आठ से दस साल लग जाएंगे। सरकार ने विदेश में डिग्री करने के बाद वहां का लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया है। एक साल वहां पर प्रैक्टिस करने के बाद लाइसेंस मिलेगा और दोनों प्रवेश परीक्षा पास करनी होगी उसके बाद ही देश में चिकित्सक की जॉब कर सकेंगे।