उदयभान त्रिपाठी
हिसार। अपने शहर का प्रत्येक व्यक्ति हर दिन औसतन 460 ग्राम कचरा उत्सर्जित करता है। इसमें सबसे अधिक 34.82 प्रतिशत बचा हुआ खाना व सब्जियों के छिलके आदि हैं, जबकि 16.39 प्रतिशत पॉलिथीन है। प्रदूषण फैला रहे इस कचरे से हर दिन करीब 15-25 टन तक कम्पोस्ट बनाई जा सकती है। इसे जलाने से सात हजार किलो कैलोरी ऊष्मा निकलेगी जो बिजली बनाने के लिए पर्याप्त है।
शहर से 10 किलोमीटर दूर सिरसा हाईवे के किनारे ढंढूर गांव में डंपिंग ग्राउंड बना है। 19 एकड़ में फैले इस डंपिंग ग्राउंड में हर दिन करीब 180 मीट्रिक टन कचरा गिराया जाता है। गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय (जीजेयू) के पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश लोहचब व शोध छात्र डॉ. अनिल नैन ने डंपिंग ग्राउंड में पहुंचने वाले कचरे का अध्ययन किया। डॉ. राजेश के अनुसार यहां पहुंचने वाले कचरे का उचित प्रबंधन नहीं होने के चलते आसपास के ग्रामीणों के स्वास्थ्य के लिए यह खतरनाक है। कचरे में सबसे अधिक हिस्सा भोजन अपशिष्ट जैसे बचा हुआ खाना, सब्जियों की छिलके, खराब फल आदि है। दूसरा प्रमुख घटक पॉलिथीन बैग (16.39 प्रतिशत) है। तीसरा अपशिष्ट कागज (4.02 प्रतिशत), प्लास्टिक व कार्डबोर्ड का है। 3.66 प्रतिशत सेनेटरी कचरा व 2.27 प्रतिशत पुराने और फटे कपड़े, बैग आदि शामिल हैं। इसके अलावा 6.34 प्रतिशत में पुआल, सूखे पत्ते, बाल और गोबर आदि अपशिष्ट हैं।
कम्पोस्ट के अलावा बिजली भी बन सकती है
ठोस अपशिष्ट के नमूने का पीएच मान 8.21 है, जो क्षारीय प्रकृति है। ठोस कचरे में 56.85 प्रतिशत बायोडिग्रेडेबल है जो मुख्य रूप से जैविक प्रकृति का होता है। इन्हें कम्पोस्ट में बदला जा सकता है। यहां से हर दिन 15 से 25 टन तक कम्पोस्ट खाद बनाई जा सकती है। इसके अलावा कचरे में उच्च पॉलिथीन और प्लास्टिक अंशों की उपस्थिति के कारण इसे जलाने पर ऊष्मा का कैलोरी मान 7165.47 किलोग्राम प्रतिदिन है। 1000-6000 किलो कैलोरी मान को उर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त माना जाता है।