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मनोरंजन के लिए नाटक-फिल्मों में परोसी न जाए अश्लीलता

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अमर उजाला के अपराजिता कार्यक्रम के दौरान हिसार कार्यालय में मौजूद अतिथिगण। संवाद - फोटो : Hisar
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हिसार। कोरोना के बाद मौजूदा समय में ओटीटी प्लेटफार्म का काफी प्रचलन है। युवा व उभरते हुए कलाकारों के लिए ओटीटी काफी अवसर लेकर आया है। ओटीटी पर अपना करिअर बनाने के लिए युवाओं व कलाकारों को इस क्षेत्र का गहराई से अध्ययन करना होगा। वहीं, मनोरंजन के लिए नाटक और फिल्मों में अश्लीलता नहीं परोसी जानी चाहिए। यह कहना है अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत शनिवार को अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम शामिल हुए कलाकारों, कवि, संगीतकार और साहित्यकारों का।
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संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्यकार कमलेश भारतीय ने की। कार्यक्रम में अभिनेता नवीन निषाद, अभिनेत्री पूनम जांगड़ा, डॉ. संध्या शर्मा, डॉ. ईशा खन्ना, रश्मि, निधि चौधरी, त्रिभुवन बख्शी ने विचार रखे। नवीन निषाद ने बताया कि पहले एक फिल्म का नाम दहिया वर्सेस मलिक था। इस नाम पर विवाद होने पर फिल्म प्रोड्यूसर ने इसका नाम गौरव की स्वीटी रखना पड़ा।
फिल्में ऐसी होनी चाहिए जो हमारे समाज को एक सकारात्मक संदेश दें। हमारी युवा पीढ़ी को समाज के प्रति जागरूक करें। मौजूदा समय में अश्लीलता भरी फिल्में रिलीज हो रही हैं। इनसे परहेज करना बहुत जरूरी है। युवाओं को साहित्य से जोड़ने के विषय पर भी फिल्में बननी जरूरी हैं। ओटीटी के लिए भी सेंसरशिप होनी चाहिए।
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- कमलेश भारतीय, साहित्यकार
युवा व उभरते हुए कलाकारों के लिए ओटीटी बहुत अच्छा प्लेटफार्म है। इस पर आने से पहले एक कलाकार को प्री प्लानिंग करनी चाहिए ताकि वह अपने लक्ष्य में कामयाब हो सके। मैंने गौरव की स्वीटी फिल्म में कर्मा मलिक का किरदार निभाया है। पहले इस फिल्म का नाम दहिया वर्सेस मलिक था। इस टाइटल पर आपत्ति होने पर फिल्म प्रोड्यूसर ने नाम बदल दिया। मेरा मानना है कि ओटीटी के लिए सेंसरशिप होनी चाहिए।
- नवीन निषाद, अभिनेता
मेरा ये कहना है कि अपनी सांस्कृतिक व परंपराओं को आगे बढ़ाने वाली फिल्मों पर ज्यादा कार्य होना चाहिए। ताकि हमारी युवा पीढ़ी को हमारी परंपराओं का पता चले। शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने वाली फिल्मों का समाज के लिए बहुत महत्व होता है। फिलहाल फिल्मों के नाम प अश्लीलता अधिक परोसी जा रही है। समाज को दिशा दिखाने वाली फिल्मों का अकाल है। अच्छे निर्माता-निर्देशकों, कलाकारों को आगे आना चाहिए।
- डॉ. संध्या शर्मा, सहायक प्रोफेसर, एचएयू
फिल्मों का सबसे ज्यादा असर युवा पीढ़ी पर पड़ता है। आजकल वेब सीरिज का प्रचलन ज्यादा है। इसलिए युवा भी वेब सीरिज ज्यादा देखते हैं। मेरा ये मानना है इंसान के पास क्रिएटीविटी बहुत बड़ी चीज होती है। इसलिए वेब सीरिज के अंदर भी युवाओं को सकारात्मक दिशा की ओर ले जाने वाली क्रिएटीविटी होनी चाहिए। ओटीटी प्लेटफार्म पर भी कुछ सेंसरशिप होनी चाहिए। किस आयु वर्ग के लिए वह उपलब्ध कराई जा रही है, इसका उल्लेख भी किया जाना चाहिए। - डॉ. ईशा खन्ना, डॉक्टर एवं गायिका
फिल्म प्रोड्यूसर द्वारा फिल्मों का रोमांचक बनाने के लिए फिल्म में आइटम सांग डाले जाते हैं। अपनी फिल्म को ज्यादा हिट करने के लिए फिल्म प्रोड्यूसर फिल्मों हर प्रकार के डायलॉग व वीडियो शूट करवाते हैं। निर्माता- निर्देशक भी समाज का हिस्सा हैं। हम अपना कंटेंट भी यहीं से चुनते हैं। कुछ क्षेत्र की भाषा को उसी रूप में दिखाने के लिए कुछ शब्दों को कलाकार को बोलना पड़ता है। दूसरे क्षेत्र के लोगों को वह गाली महसूस होती है। उस क्षेत्र के लोगों के लिए वह साधारण बोलचाल का हिस्सा है। - पूनम जांगड़ा, अभिनेत्री
मनोरजंन के नाम पर दर्शकों को कुछ भी नहीं दिखाना चाहिए। फिल्मों पर अश्लीलता नहीं होनी चाहिए। फिल्मों में जो गाली-गलौज करने का प्रचलन आया है, वह नहीं होना चाहिए। इससे युवा पीढ़ी पर बुरा असर पड़ रहा है। समाज हित के लिए भी बनी फिल्मों का हमेशा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भाषा ऐसी होनी चाहिए जो हम अपने परिवार के साथ देख सकें। - रश्मि, डीवाईल्यूओ, जीजेयू
आज के समय में इंटरनेट, यू ट्यूब पर हर चीज उपलब्ध है। कोरोना के कारण ऑनलाइन पढ़ाई के लिए छोटे बच्चों को भी मोबाइल-इंटरनेट देने को मजबूर होना पड़ता है। समय के अनुसार हमें बच्चों को सेक्स एजुकेशन भी देनी चाहिए। बच्चों को एड्स सहित अन्य बीमारियों के बारे में जानकारी देनी चाहिए। अगर हम बच्चों को सही जानकारी नहीं देंगे तो वह किसी दूसरी जगह से गलत शिक्षा हासिल कर सकते हैं। इन सभी पर कुछ हद तक प्रतिबंध होना चाहिए। - निधि चौधरी, कलाकार
आज फिल्मों के स्तर में गिरावट आई है। आज के समय में बच्चों को सभी कुछ तुरंत चाहिए। जिस कारण बच्चे भी यौन संबंधी वीडियों की ओर आकर्षित होते हैं। ओटीटी प्लेटफार्म आने के बाद भाषा का स्तर गिरा है। कुछ गाली-गलौज का उपयोग सामान्य हो गया है। ओटीटी के लिए मानक होना चाहिए। एक सेंसरशिप लगाई जाए, जिससे कुछ अच्छी सामग्री उपलब्ध हो सके। - त्रिभुवन बख्शी, गायक
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