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लंपी पॉक्स : लंपी : बीमार 55 गोवंश उपचार के बाद स्वस्थ, नहीं मिला नया केस

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हिसार। लंपी पॉक्स बीमारी के फैलाव को रोकने के लिए पशुपालन विभाग के अलावा लाला लाजपतराय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) ने भी एडवाइजरी जारी की है। जिले में अब तक बीमार चिह्नित 70 गोवंश में से 55 पशु स्वस्थ हो गए हैं और 15 का उपचार चल रहा है। राहत की बात यह है कि कोई नया केस नहीं आया है। इसके अलावा अभी जिले में किसी भैंस में इस बीमारी के लक्षण नहीं मिले हैं।
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पशुपालन विभाग का दावा है कि संवेदनशील इलाके में टीकाकरण के साथ-साथ जागरूकता अभियान भी शुरू किया गया है। पड़ोसी राज्य राजस्थान में लंपी पॉक्स बीमारी का संक्रमण तेज है, जिसके चलते जिले के पशुओं पर भी संकट बना हुआ है। पशुपालन विभाग के उप निदेशक ने बताया कि जिले में अभी तक 70 गोवंश इस बीमारी की चपेट में आए हैं, जिनमें से सभी राजस्थान बार्डर के नजदीक की गोशाला के हैं। इसको ध्यान में रखते हुए पहले संवेदनशील इलाके में ही टीकाकरण व जागरूकता कैंप चलाए जा रहे हैं।
बीमार पशु को मच्छरदानी लगाकर करें आइसोलेट
लाला लाजपत राय पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय ने गांव रसिन व घरौंडा में जागरूकता शिविर लगाया किया। शिविर में लंपी बीमारी के लक्षण व बचाव की जानकारी दी गई।
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विशेषज्ञ डॉ. सुजाय खन्ना ने बताया कि इस बीमारी से गाय व भैंसों की सभी उम्र और नस्लें प्रभावित होती हैं। जिन पशुओं कि प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है वही ज्यादा प्रभावित होते हैं। तेज बुखार, उदासी, खाने में अरुचि, नाक एवं आंखों से पानी गिरना, दूध उत्पादन में कमी होना एवं त्वचा पर बड़ी गांठों का बनना इस रोग के लक्षण है। डॉ. हरिओम शर्मा ने पशुपालकों को बताया कि बीमार पशुओं को स्वस्थ जानवरों से अलग करें। पशुओं के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल करें।
भैंस पालकों की बढ़ी चिंता : गोवंश के बाद अब कई जिलों में भैंसों में भी लंपी पॉक्स के लक्षण पाए जाने के बाद जिले के दुग्ध उत्पादक परेशान हैं। बुधवार को कई पशुपालकों ने हांसी के राजकीय पशु अस्पताल, लुवास के पशु अस्पताल समेत अन्य अस्पतालों में संपर्क कर इस बीमारी के लक्षण व बचाव की जानकारी ली। राजकीय पशु अस्पताल हांसी के सिविल सर्जन डॉ. सुधीर मलिक बताते हैं कि अभी अपने क्षेत्र में भैंसों में इस बीमारी का लक्षण नहीं मिला है, लेकिन पशुपालकों को सलाह दी गई है कि वे लक्षण दिखते ही तुरंत सूचित करें। इसके अलावा संक्रमित पशु को अन्य पशुओं से अलग रखें।
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