ग्लैंडर्स पीड़ित घोड़ियों की मौत के बाद मालिक सदमे में है। जिन घोड़ियों से गुजर-बसर चलता था, वो लाखों रुपये की घोड़ियां मारी जा चुकी हैं। ऐसे में पशुपालक के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया है। पशुपालक संतलाल स्वयं जेबीटी पास है। उन्होंने 1998 में जेबीटी की थी। पुश्तैनी काम और घोड़ियों से प्यार उन्हें इस काम की तरफ खींच लाया। उन्होंने बताया कि उनके यहां पर 5-6 परिवार हैं, जो घोड़ियों से ही अपना परिवार चलाते हैं। इन घोड़ियों को शादियों, तांगा आदि में इस्तेमाल किया जाता है, इसके बदले जो पैसे मिलते हैं, उसी से घर चलता है। अब एक ही घर से अचानक पांच घोड़ियों का चले जाना किसी सदमे से कम नहीं है। इसी परिवार की दो घोड़ियों की पूर्व में भी मौत हो चुकी है। उन्होंने बताया कि घोड़ियां परिवार के सदस्यों की तरह थीं और लगाव के साथ उनका लालन-पालन होता था।
मुआवजा बढ़ाने के लिए उपायुक्त को सौंपेंगे ज्ञापन
उन्होंने बताया कि घोड़ियों की मौत के बाद परिवार पर रोजगार के बादल तो मंडरा ही रहे हैं। साथ ही पशुपालन विभाग द्वारा भारत सरकार की तरफ से दी जाने वाली 25 हजार की राशि भी कम है। उनकी प्रत्येक घोड़ी की कीमत एक लाख रुपये से अधिक थी। ऐसे में उन्हें इससे काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकार भी ग्लैंडर्स पीड़ित घोड़ियों को मारने पर कुछ मुआवजा दे, ताकि राहत मिल सके और आगे भी वे अपना रोजगार जारी रख सके। घोड़ी मालिकों ने बताया कि वे ग्लैंडर्स के इलाज और घोड़ियों की मौत पर मिलने वाले मुआवजे को लेकर मंगलवार को उपायुक्त से मिलेंगे और उन्हें ज्ञापन सौंपेंगे।
ग्लैंडर्स के कारण पांच घोड़ियों को उतार दिया था मौत के घाट
शहर के सैनियान मोहल्ले में एक पशुपालक की पांच घोड़ियों में ग्लैंडर्स मिला था, जिसके बाद पशुपालन विभाग और केंद्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र हिसार के वैज्ञानिकों की टीम ने इन घोड़ियों को निर्धारित वैैैज्ञानिक तरीके से बिना दर्द के जहरीला इंजेक्शन देकर मार दिया है। ये वो घोड़ियां हैं, जिनका इस्तेमाल शादियों में दूल्हे को बैठाने के लिए किया जाता था और इन्हीं से परिवार का रोजगार चलता था। वहीं, इस बीमारी के आने के बाद पशुपालन विभाग अब पांच किलोमीटर के दायरे के अश्व प्रजाति के सभी पशुओं के सैंपल लेने की प्रक्रिया में लगा है।