इस्राइल में एक प्रतिशत से भी कम लोग खेती करते हैं। मगर यह देश कृषि के क्षेत्र में दूसरों देशों के लिए एक उदाहरण बन रहा है। यह बात इस्राइल की हेबर यूनिवर्सिटी के प्रो. बेरूच रूबिन ने कही। वह एचएयू में चल रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने आए हुए हैं। इस दौरान उन्होंने बताया कि इस्राइल में ज्यादातर किसान मिलकर खेती करते हैं। इससे लागत कम आती है और सभी किसानों के बीच खर्चा बंट जाता है। साथ ही मुनाफा भी बढ़ता है। उन्होंने बताया कि उनके देश में खेती में पेस्टीसाइड्स के इस्तेमाल को लेकर सरकार काफी सख्त है। इस मामले में किसानों को सख्त हिदायत है कि वह जरूरत से ज्यादा पेस्टीसाइड्स का इस्तेमाल न करें। प्रो. रूबिन ने बताया कि इजराइल में किसानों का पास खेती की नवीनतम तकनीक है, इसलिए वहां खेती फायदे का सौदा है।
फव्वारा सिस्टम से होती है सिंचाई
उन्होंने बताया कि इस्राइल में साल में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं। कपास, गेहूं, सोयाबीन व बाजरा वहां की प्रमुख फसलें हैं। बाजरा की खेती वह पशुओं के चारे के लिए करते हैं। वहां सिंचाई फव्वारा सिस्टम से की जाती है, क्योंकि वहां पानी कम है। इस तकनीक का ईजाद इस्राइल ने ही किया था। प्रो. रूबिन के मुताबिक इस्राइल सरकार रिसर्च पर काफी खर्च करती है। वहां काफी निजी विश्वविद्यालयों को सरकार रिसर्च के लिए बजट उपलब्ध कराती है।
नैनो टेक्नोलॉजी काफी महत्वपूर्ण
उधर, सम्मेलन के दूसरे दिन यूएसए के न्यू हेवन के वाइस डायरेक्टर एवं चीफ एनालिटिकल केमिस्ट प्रो. जेसन वाइट ने बताया कि कृषि क्षेत्र में आ रही चुनौतियां से निपटने के लिए नैनो टेक्नोलॉजी का विशेष योगदान होगा। नैनो फर्टिलाइजर, नैनो पेस्टीसाइड के अलावा इस तकनीक से मृदा की गुणवत्ता को भी मॉनीटर किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि नैनो फर्टिलाइजर के इस्तेमाल से मृदा जनित फफूंद रोग जैसे फयूजेरियम व वर्टिसीलियम पैथोजेन को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी।
फिलीपींस के एशिया इंटरनेशनल पोटेटो सेंटर के रीजनल डायरेक्टर डॉ. एस मोहेन्ती एवं भारतीय कृषि अनुसंधान के पूर्व डीडीजी प्रो. गजेंद्रा सिंह ने कन्नदीय फसलों को उगाकर किसानों की आय बढ़ाने व पोषण प्रबंधन में लाभदायक होने के बारे में भविष्य की योजनाएं बताई। कन्नदीय फसलें जैसे आलू व शकरकंदी उगाकर जहां एक और खेती को अधिक लाभप्रद बनाया जा सकता है, वहीं अधिक कार्बोहाइड्रेट व पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं।
खाद्य सुरक्षा के 2050 के विजन को किया प्रस्तुत
यूएसए के मेसाच्यूसेट विश्वविद्यालय के डॉ. ओपी. धनखड़ ने अपनी शोध प्रस्तुति में खाद्यान्न संरक्षण की महता और इसकी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बारे में अपने विचार व्यक्त किए। इसी के साथ उन्होंने अरसेनिक की मात्रा बढ़ने से होने वाले त्वचा, लीवर और फेफड़ों पर पड़ने वाले प्रभाव की भी चर्चा की। इस्राइल की हेबर यूनिवर्सिटी के प्रो. बेरूच रूबिन ने फसल संरक्षण एवं खाद्यान्न सुरक्षा के 2050 के विजन को प्रस्तुत किया। इस्राइल के प्रो. द्रोर मिंज ने पौधों के साथ सूक्ष्म जीवों की इंटरेक्शन विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
मानचेस्टर विश्वविद्यालय के प्रो. मनोज कुमार ने सेल्यूलोस सिंथेसिस इन हायर प्लांट्स विषय पर अपने व्याख्यान दिए। किंग अब्दुल्ला विश्वविद्यालय, सऊदी अरबिया के प्रोफेसर डॉ. रामकरण ने एक्सट्रिमोफाइलस एंड एक्सट्रिमोजाइमस : बायोटेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग स्ट्रेस टॉलरेंस के महत्व पर अपने विचार प्रस्तुत किए। यूएसए के इलीनोइस विश्वविद्यालय के डायरेक्टर डॉ. विजय सिंह ने लॉ कोस्ट कार्बन एंड सिंथेटिक बायोलॉजी मीटिंग द फ्यूचर फूड, फ्यूल एंड बायोप्रोडक्ट नीड्स पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। ब्राजील की फेडरल रूरल यूनिवर्सिटी की प्रो. केमला फेरेलरा दा पिनो ने चैलेंजिंज इन वीड मैनेजमेंट इन ब्राजीलियन एग्रीकल्चर पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। कनाडा के प्रो. शहाबुद्दीन शाखानसंज ने डेनसीफिकेशन-ए की टू फेसीलिटेट हैंडलिंग ऑफ बायोमास पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए।