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हरियाणवी संस्कृति को सहेजने में जुटी महिला कलाकार

Mon, 18 Apr 2016 01:10 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हिसार
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हरियाणवी संस्कृति को सहेजने में जुटी महिला कलाकार - फोटो : bureau
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हरियाणवी लोक संस्कृति को बचाना और उसेे देश-विदेश में पहचान दिलाना वर्तमान में हरियाणा के कलाकारों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। हरियाणा के लोक कलाकार इस दिशा मेेें लगातार कोशिश कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं ऑन थियेटर ग्रुप हरियाणा की निदेशिका डॉ. मंजू तोमर।
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अब तक कई अंतरराष्ट्रीय फेस्टिवल आयोजित करवा चुकी डॉ. मंजू तोमर पिछले आठ सालों से हरियाणवी संस्कृति को सहेजने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। वे अब तक इंडो-अमेरिका, इंडो-पाक, इंडो-नेपाल, इंडो अफ्रीका आदि फेस्टिवल आयोजित करवा चुकी हैं।

इनमें विदेशी कलाकारों को हरियाणवी लोक संस्कृति, हरियाणा की बोली, वेशभूषा आदि से रूबरू होने का मौका मिला। रंगमंच की इनकी उपलब्धियों के लिए इन्हें हरियाणा संगीत नाट्य अकादमी और पश्चिम बंगाल की रंगमंच संस्था गुरहटी सम्मानित कर चुकी हैं।
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बचपन से ही सुनती थीं लोक कथाएं
मूलरूप से उकलाना के गांव भेरी अकबरपुर की रहने वाली डॉ. मंजू तोमर ने बताया कि वह बचपन से ही अपने माता-पिता से लोक कथाएं सुनती थीं। जैसे-जैसे बड़ी हुई, हरियाणवी संस्कृति में रुचि बढ़ती गई। कॉलेज के दौरान होने वाले यूथ फेस्टिवल मे हिस्सा लेने लगी।

हरियाणवी संस्कृति के प्रति लगाव का ही नतीजा है कि वे अब तक दर्जनों नाटकों का निर्देशन करने के साथ करीब 12 नाटक लिख चुकी हैं। इनमें मेरी बेटी-मेरा वैभव, दादा फौजी, कुणबा घाणी आदि शामिल हैं।

शादी के बाद किया थियेटर एपरिसेसन कोर्स
डॉ. मंजू की शादी 2005 में ही जींद में डॉ. पवन के साथ हो गई थी। शादी के बाद अक्सर महिलाएं अपनी गृहस्थी संभालने में मशगूल रहती हैं, लेकिन डॉ. मंजू ने शादी के बाद दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से थियेटर एपरिसेसन कोर्स करके दिखा दिया कि मौका मिलने पर वे किसी भी मुकाम को हासिल कर सकती हैं।

इन नाटकों का किया मंचन
हिंदी में पीएचडी कर चुकी डॉ. मंजू ने ऑनर किलिंग को लेकर खप्पर भरणी, जौरू और जमीन को लेकर कुणबा घाणी, संस्कारहीनता पर माणस कड़ै मरगै के साथ दादा की पोती, भतेरी ताई, दादा फौजी, मेरी बेटी, मेरा गहना आदि दर्जनों नाटकों का मंचन कर चुकी हैं।

इसके अलावा शेक्सपियर और गिरीश कर्नाड के दर्जनों नाटकों का हरियाणवी में रूपांतरण कर मंचन कर चुकी हैं। हाल ही में उन्होंने दिल्ली में गिरीश कर्नाड के हेवतन नाटक का हरियाणवी में अनुवाद कर मंचन किया था। वे इस नाटक का 12 बार मंचन कर चुकी हैं।

जब नाटक बन गया हकीकत
डॉ. मंजू ने बताया कि एक बार वे नेशनल नाटक फेस्टिवल में भाग लेने के लिए कलाकारों के साथ जालंधर जा रहे थे। लुधियाना से निकलकर ढाबे पर विश्राम के लिए कुछ समय रुके। वहां पर काफी भीड़ देखकर बैठे-बैठे नाटक का मंचन शुरू कर दिया।

लोगों ने हकीकत समझी और पुलिस भी आ गई। बाद में भीड़ और पुलिस को पता चला कि यह तो महिला उत्पीड़न और घरेलू कलह को लेकर नाटक खेला जा रहा था।  

महिलाओं को रंगमंच से जोड़ना मकसद
डॉ. मंजू तोमर ने बताया कि वे अधिक से अधिक महिलाओं को रंगमंच से जोड़ना चाहती हैं। क्योंकि अब तक थियेटर में पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है। वे चाहती हैं कि महिलाएं अपने राज्य की लोक संस्कृति को बचाने के लिए आगे आएं और स्वावलंबी बनें।
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