हिसार। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी अदालत की डिक्री के निष्पादन के दौरान निष्पादन अदालत अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नए विवाद पर फैसला नहीं दे सकती। यदि किसी पक्ष को मूल निर्णय या उसमें दर्ज निष्कर्षों पर आपत्ति थी तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत अपील करनी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विभागीय जांच तय समयसीमा में पूरी नहीं होने पर कर्मचारी को वेतन और अन्य बकाया लाभ देने के आदेश से पीछे नहीं हटा जा सकता। जस्टिस अमरजोत भट्टी ने हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय (जीजेयू) की ओर से दायर सिविल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा।
मामला विश्वविद्यालय कर्मचारी कमल दीप से जुड़ा है जिन्होंने 8 मार्च 2010 को जारी दंड आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने 30 सितंबर 2015 को दंड आदेश को तकनीकी आधार पर रद्द कर विश्वविद्यालय को नई विभागीय जांच की अनुमति दी थी। अदालत ने निर्देश दिए थे कि जांच निर्धारित समय में पूरी की जाए, अन्यथा कर्मचारी वेतन और अन्य बकाया लाभ पाने का अधिकारी होगा।
रिकॉर्ड के अनुसार, विभाग जांच समय पर पूरी नहीं कर सका। जांच 5 मई 2016 को पूरी हुई और अंतिम आदेश 23 नवंबर 2016 को पारित किया गया। कर्मचारी ने इसी आधार पर बकाया वेतन की मांग की।
विश्वविद्यालय ने देरी का कारण कुछ गवाहों के विदेश जाने और ई-मेल के माध्यम से बयान दर्ज करने को बताया। साथ ही पंजाब सिविल सेवा नियमों का हवाला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि मूल डिक्री के खिलाफ अपील न करने के बाद निष्पादन के दौरान उसके निष्कर्षों को चुनौती नहीं दी जा सकती।