फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

43 महीनों में होनी थी 43 बैठक, हो पाई केवल 12 जिनके एजेंडे भी अधूरे

Wed, 18 Jan 2017 12:27 AM IST
अमर उाला ब्यूरो/हिसार
विज्ञापन
विज्ञापन
शहर की सरकार बने लगभग साढ़े तीन साल से ज्यादा समय हो गया है। निगम एक्ट के मुताबिक अब तक शहर के विकास को गति देने के लिए हर महीने के हिसाब से 43 मीटिंग हो जानी चाहिए थी। मगर हाउस बैठा केवल 12 बार ही। नगर निगम के पार्षद विशेषकर मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर व डिप्टी मेयर इसको लेकर निगम अधिकारियों व कमिश्नर को जिम्मेवार ठहरा रहे हैं। मेयर, सीनियर डिप्टी मेयर व डिप्टी मेयर ने कहा है कि हैरानी की बात है कि शहर के मुख्य एजेंडे आज तक सिरे नहीं चढ़ पाए हैं। पहली मीटिंग से लेकर नवंबर 2016 में हुई आखिरी मीटिंग तक ये ही एजेंडे बार बार रखे गए हैं।
विज्ञापन


केवल सड़क, स्ट्रीट लाइट व पार्क तक सीमित नगर निगम
हाउस में 300 से ज्यादा एजेंडे रखे जा चुके हैं। पार्षदों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों की नियत शहर के विकास को लेकर सही है मगर अधिकारी रोड़ा अटका रहे हैं। हाउस में एजेंडा पास होने के बाद निगम अधिकारी उन कार्यों को फॉलो नहीं करते। जब जनप्रतिनिधि स्टेटस रिपोर्ट मांगते हैं तो मीटिंग छोड़कर चले जाते हैं। निगम केवल सड़क, स्ट्रीट लाइट व पार्क बनवाने तक ही सीमित है।

ये हैं शहर के मुख्य एजेंडे जो आज तक नहीं चढ़े सिरे
- डोर टू डोर कचरा उठाने की प्लानिंग
- धोबीघाट प्रोजेक्ट
- स्लॉटर हाउस
- अवैध मीट मार्केट
- डेयरी शिफ्टिंग
- सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट।
- सिटी थाना के सामने मल्टीलेवल पार्किंग।
- शहर को लावारिस पशु मुक्त करना।
- स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी
- शहर के यातायात के लिए कांप्रिहेंसिव मॉबिलिटी प्लान लागू करना।
- ग्रीन एंड क्लीन हिसार प्रोजेक्ट
- पॉलीथिन मुक्त करने का अभियान।

क्या कहता है एक्ट
निगम एक्ट 1994 के तहत सेक्शन 53 ए में लिखा गया है कि हाउस की मीटिंग हर माह होनी चाहिए। एक्ट के अनुसार अगर लगातार तीन महीने तक मीटिंग नहीं होती है तो सदन को भंग करने की सिफारिश की जा सकती है। तीन महीने में कम से कम एक बार बैठक करना अनिवार्य है।
विज्ञापन


जानिए कब कब हुई हाउस की मीटिंग
1. शहर की सरकार बनते ही सबसे पहले 3 अक्तूबर 2013 को पहली बार हाउस बैठा।
2. 29 जनवरी 2014 को
3. 2 जून 2014 को
4. 12 सितंबर 2014 को
5. 27 अक्तूबर 2014 को
6. 29 जनवरी 2015 को
7. 15 जुलाई 2015 को
8. 19 नवंबर 2015 को
9. 2 फरवरी 2016 को
10. 10 मार्च 2016 को
11. 4 जुलाई 2016 को
12.  19 नवंबर 2016 को

असल में कहां है अड़चन
नगर निगम में असल में हाउस की बैठक को लेकर बड़ी अड़चन अधिकारियों की मनमानी है। मेयर व पार्षद हर बार हाउस की मीटिंग में कमिश्नर को बुलाने के लिए अड़ जाते हैं। मगर कमिश्नर सहित कई अधिकारी अक्सर मीटिंग में आने से बचते हैं। दूसरा कारण निगम में कांग्रेस की राजनीति हावी होना व बीजेपी की हाउस में कमजोर राजनीति होना भी है।

मना लेते हैं अधिकारी जनप्रतिनिधियों को
निगम में जब जब सरकारी एजेंडे पास करने की नौबत आई है तब तब अधिकारियों ने मेयर व पार्षदों को राजी कर अपने हिसाब से मीटिंग बुलाई है। इनमें से कई ऐसी मीटिंग हैं जब न कि मेयर की इच्छाशक्ति से बुलाई गई बल्कि अधिकारियों की रिक्वेस्ट पर बुलाई गई है।

वर्तमान का ये स्टेटस
मेयर ने नवंबर की मीटिंग में हंगामा होने के बाद से दिसंबर में मीटिंग बुलाने के लिए डीसी को अवगत करवाया था। मगर निगम के उच्च अधिकारी मीटिंग में आने के लिए तैयार नहीं। दिसंबर से टाइम फिक्स होते होते कमिश्नर ने जनवरी का टाइम रख दिया जो फिलहाल फरवरी के फर्स्ट वीक में खिसक चुका है। हालांकि इस टाइम पर मेयर ने निगम कमिश्नर से मिलकर सहमति ली है। मेयर व पार्षदों ने कहा कि जब आप मीटिंग में आओगे तभी मीटिंग होगी वरना नहीं।

हाउस की हर महीने बैठक होनी चाहिए। हमने हमेशा प्रयास भी किए। मगर मैं इसको लेकर निगम कमिश्नर को जिम्मेवार मानता हूं। कमिश्नर ने कभी हाउस की मीटिंग के लिए टाइम नहीं मांगा। जो एजेंडे हाउस में पास होते हैं सड़क स्ट्रीट लाइट व पार्कों को छोड़कर आज तक सिरे नहीं चढ़े। शहर के मुख्य एजेंडे हाउस में तो हर बार पास हो जाते रहे हैं मगर उनका स्टेटस तो अभी तक जीरो ही रहा है।
- दयानंद सैनी, सीनियर डिप्टी मेयर

एक्ट के अनुरूप हर महीने बैठक होनी चाहिए। मगर यहां स्थायी अधिकारियों की नियुक्ति न होने के कारण मीटिंग नहीं हो पा रही। जो एजेंडे पहली मीटिंग में रखे गए थे आज तक वही दोहराए जा रहे हैं मगर उनपर अधिकारी काम ही नहीं कर रहे। चाहे वो डेयरी शिफ्टिंग हो या सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट आज तक सारे अधूरे पड़े हैं।
- भीम महाजन, डिप्टी मेयर।

हाउस की मीटिंग हर महीने न हो पाने के जिम्मेवार प्रशासनिक अधिकारी हैं। जिन अधिकारियों के साथ हर रोज बैठते हैं उनके साथ तो कार्यालय में बैठकर भी किसी प्रोजेक्ट पर चर्चा की जा सकती है। मगर जो अधिकारी यहां नहीं बैठते और फिर हाउस की मीटिंग हो तब ना आए तो फिर मीटिंग करने का क्या फायदा। उच्च अधिकारियों को भी तो पता होना चाहिए कि उनका यहां का स्टाफ क्या काम कर रहा है और पास हुए एजेंडों पर क्या वर्क किया।
विज्ञापन

- शकुंतला राजलीवाला, मेयर हिसार
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें