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किसानों ने छह हजार रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से बेची पराली

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हिसार। प्रदूषण का कारक बन रही पराली अचानक कीमती हो गई है। वजह इतनी है कि बेलर मशीन संचालक खेत से पराली की गांठ बनाकर बायोगैस प्लांट पर बेचने लगे हैं। इसके अलावा राजस्थान के पशुपालक चारे के लिए भी पराली खरीदकर ले जा रहे हैं। इसका असर यह हुआ कि पिछले साल जो पराली प्रदूषण व मुकदमे का सबब बन रही थी, वही इस बार छह हजार रुपये प्रति एकड़ के भाव बिक रही है। हिसार जिले में इस बार नवंबर में पराली जलाने की केवल एक घटना दर्ज हुई है, जबकि पिछले साल यह संख्या 21 थी।
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जिले में लगभग एक लाख 87 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान की खेती होती है। कंबाइन मशीनों से फसल कटाई के बाद खेत में अवशेष बची पराली किसी काम में नहीं आती थी। गेहूं की बिजाई के लिए खेत को खाली करना भी जरूरी था। लिहाजा किसान फसल अवशेष को खेत में ही जला दिया करते थे। इसको देखते हुए सरकार ने पराली जलाने पर सख्ती से रोक लगा रखी है। साथ ही इसे मिट्टी में मिलाने के वैकल्पिक उपायों पर भी जोर दिया जा रहा है। इन प्रयासों का नतीजा है कि जगह-जगह बायोगैस प्लांट बनने लगे हैं, जिसमें कच्चे माल के तौर पर सर्वाधिक पराली का ही उपयोग होता है।
बरवाला क्षेत्र के किसान ईश्वर सिंह, रमेश, आत्माराम, राजेंद्र आदि ने बताया कि इस बार जिन खेतों में कंबाइन मशीन से धान की कटाई हुई, वहां पराली की गांठ बनाने वाली मशीनों के संचालकों ने पराली निकाल ली। इसके अलावा जिन किसानों ने फसल की कटाई हाथ से कराई थी, उन्होंने पराली को चारे के तौर पर बेच दिया। किसानों ने बताया कि इस बार पराली के लिए प्रति एकड़ छह हजार रुपये तक मिले हैं। मशीन से पराली की गांठ बनाने वालों ने इस पराली को ले जाकर मिलों को बेंच दिया। वहीं बड़ी संख्या में राजस्थान से आए पशुपालक पराली को चारे के लिए खरीदकर ले गए। इससे खेत भी आसानी से खाली हो गया और पराली जलाने की नौबत भी नहीं आई।
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प्लांट लगने पर और बढ़ेगी कीमत
पराली से बायोगैस बनाने के लिए हिसार जिले में तीन प्लांट लगे हैं, जिनमें से एक एचएयू में, एक उकलाना और एक नारनौंद क्षेत्र में है। एचएयू में करीब छह करोड़ की लागत से बन रहे प्लांट में बिजली उत्पादन भी होना है। अगर यह प्लांट चालू होता है तो हिसार शहर के घरों से निकलने वाले कचरे का भी उसमें उपयोग होगा। उकलाना व नारनौंद में बनने वाले प्लांट जब चालू होंगे तो उनकी डिमांड को पूरा करने के लिए पराली कम पड़ने लगेगी। इन तीनों ही प्लांट में बायोगैस उत्पादन के अलावा कम्पोस्ट खाद भी बनेगी, जिसे किसानों को सस्ते दर पर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे खेती में रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने में भी मदद मिलेगी।
प्रदेश में 3233, हिसार में केवल 79 जगह जली पराली
पराली के सही प्रबंधन से हिसार जिले में इसे जलाने के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो 16 नवंबर तक पूरे प्रदेश में 3233 जगहों पर पराली जलाने के मामले सामने आए हैं, जिसमें हिसार में केवल 79 जगह जली है। वहीं अंबाला में 218, फतेहाबाद में 697, जींद में 441, कैथल में 658, करनाल में 296, कुरुक्षेत्र में 293 और सिरसा में 200 जगहों पर पराली जलाई जा चुकी है।
कोट
‘किसानों में जागरूकता आने का असर दिख रहा है। तमाम किसानों ने पराली की गांठ बनवा दीं तो कुछ ने इसे चारे के लिए भी बेच दिया। इससे किसानों को फायदा मिला है। किसानों ने पराली को खेत की मिट्टी में भी मिलाना शुरू कर दिया है। पराली को खेत की मिट्टी में मिलवाने या गांठ बनवाने वाले किसानों को सरकार की तरफ से प्रति एकड़ एक हजार रुपये की दर से भी लाभ मिला है। बायोगैस प्लांटों के चालू होने पर अगले साल पराली और कीमती हो जाएगी।’
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- गोपीराम सांगवान, सहायक अभियंता-कृषि
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