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कोरोना के भय ने बढ़ाया डिलिवरी का खर्चा, गूंजी किलकारी तो मिली खुशी

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अपने बेटे के साथ अंजू। - फोटो : Hisar
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कोरोना महामारी के प्रकोप ने आमजन में भय और खौफ को भी पैदा किया। इस दौरान अनेक डिलिवरी भी हुईं। ऐसे में उन लोगों के मन और गर्भवती महिला व उनके परिजनों में इस महामारी का भय कुछ ज्यादा ही रहा, जिनकी डिलिवरी पिछले वर्ष उस समय हुई, जिस समय यह महामारी चरम पर थी।
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ऐसे लोगों से बातचीत में पता चला कि उन्होंने सरकारी अस्पतालों में डिलिवरी कराने की बजाय निजी अस्पतालों को चुना। इस कारण यह था कि सरकारी अस्पतालों में कोरोना मरीजों की भरमार थी और ज्यादातर सेवाएं कोरोना से संबंधित ही दी जा रही थीं। ऐसे में कोई भी अभिभावक किसी भी प्रकार रिस्क नहीं लेना चाहता था। ऐसे में जहां सरकारी अस्पताल में उनका कोई खर्च नहीं होना था, वहीं निजी अस्पतालों में उन्हें एक डिलीवरी के 25-30 हजार रुपये खर्च करने पड़े। हालांकि ऐसे अभिभावकों का कहना है कि खर्च के बाद जब उनके आंगन में बच्चे की किलकारी गूंजी तो वे खर्च या अन्य सब बातों को भूल गए और उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। हालांकि लॉकडाउन के चलते उन्हें तमाम परेशानियों से गुजरना पड़ा, क्योंकि इस दौरान न तो पर्याप्त सुविधाएं थीं और न ही घर से बाहर निकलने की छूट थी।
29 जून 2020 को मेरी पत्नी 23 वर्षीय अंजू ने बेटे को जन्म दिया था। उस समय लॉकडाउन के चलते ज्यादातर जगहों पर नाममात्र सुविधा भी नहीं थी। दूसरी तरफ कोरोना का भय भी था। हमारे क्षेत्र के अधिकांश लोग उपचार के लिए अग्रोहा मेडिकल कॉलेज में ही जाते हैं, क्योंकि यही नजदीकी बड़ा अस्पताल है। इस बार मेडिकल कॉलेज में ज्यादा कामकाज कोरोना को लेकर ही किया जा रहा था और हर समय कोरोना मरीज दाखिल रहते थे। ऐसे में वहां पर कोरोना संक्रमित होने का अधिक डर था इसलिए मैंने अपनी पत्नी की डिलिवरी शहर के निजी अस्पताल में करवाई, जहां पर मुझे इलाज के लिए करीब 25 हजार रुपये चुकाने पड़े। इससे पहले मेरी पत्नी ने बेटी को जन्म दिया और वह डिलिवरी मेडिकल कॉलेज में निशुल्क हुई थी। -प्रदीप कुुमार, गांव किरमारा।
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19 मई को 2020 को मेरी पुत्रवधू 39 वर्षीय राजबाला ने पोते को जन्म दिया था। वह दौर काफी विकट परिस्थितियों का था और उस समय लॉकडाउन के कारण काफी पाबंदी लगाई गई थी। एक तरफ कोरोना का भय भी था। सरकारी अस्पतालों में कोरोना को लेकर अधिक व्यवस्थाएं की गई थीं। ऐसे में संक्रमण फैलने का अधिक खतरा था इसलिए मैंने अपनी पुत्रवधू को निजी अस्पताल में ही दाखिल करवाया था। वहां पर इलाज के लिए करीबन 30 हजार रुपये चुकाने पड़े थे। - डॉ. महेंद्र सोनी, सेवानिवृत्त जिला आयुष ऑफिसर, सेक्टर 13 निवासी।
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