राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में प्रशिक्षण लेने आए चिकित्सकों के साथ केंद्र के निदेशक डॉ.
हिसार। केंद्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में वन हेल्थ प्रोग्राम के तहत 5 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला सोमवार से शुरू हुई। संस्थान के निदेशक डॉ. टीके दत्ता ने प्रशिक्षण का शुभारंभ करते हुए कहा कि आज स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार बदलाव आ रहे हैं। बीमारियों के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। जूनोटिक बीमारियों को लेकर अधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है। पशुओं का स्वास्थ्य बिगड़ा तो मानव का स्वास्थ्य खराब होना भी तय है। ऐसे में दोनों क्षेत्र के चिकित्सकों को मिलकर काम करना होगा। पांच दिवसीय कार्यशाला में तमिलाड़ू के 30 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। जिसमें वेटरनरी चिकित्सक शामिल हैं। इन पशु चिकित्सकों को 5 दिनों तक जूनोटिक बीमारियों के बारे में प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्हें जूनोटिक बीमारियों के सैंपल लेने की ट्रेनिंग दी जाएगी। राष्ट्रीय अश्व केंद्र के निदेशक डॉ. टीके भट्टाचार्य ने कहा कि कोविड 19 ने दुनिया को बदलने का काम किया। इसके बाद विश्व भर के वैज्ञानिकों ने वन हेल्थ पर फोकस किया। अब जूनोटिक बीमारियों पर काम करना होगा। इसके लिए इंडिया में वन हेल्थ प्रोग्राम लांच किया गया। जिसमें मानव से पशुओं तथा पशुओं से मानव में आने वाली बीमारियों पर पशुओं- मानव के चिकित्सकों को जागरूक किया जाएगा। बीमारी की जड़ तक पहुंचना होगा तभी हम उसे पूरी तरह से समाप्त कर पाएंगे।
कोर्स को-ऑर्डिनेटर वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एच सिंघा ने बताया कि प्रशिक्षण लेने के बाद यह सभी चिकित्सक रिपोर्टिंग ऑफिसर के तौर पर काम करेंगे। वहां जूनोटिक बीमारी के लक्षण मिलने पर हमें रिपोर्ट करेंगे। इसके अलावा सैंपल भेजने में भी भूमिका निभाएंगे। प्रशिक्षण के दौरान इन प्रतिभागियों को टीबी, रैबीज, ग्लैंडर्स सहित अन्य बीमारियों के बारे में जानकारी दी जाएगी। प्रतिभागियों को सैंपल लेने का तरीका भी सिखाया जाएगा। इन सभी को प्रमाण पत्र भी जारी होंगे।