भाजपा द्वारा सोमवार को जारी अपने प्रत्याशियों की लिस्ट में जिले की 7 विधानसभा सीटों में से 6 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। फिलहाल आदमपुर सीट से उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की गई है। जिन 6 उम्मीदवारों की घोषणा की है, उनमें तीन प्रत्याशी वर्ष 2014 का विधानसभा चुनाव लड़ने वाले ही हैं, जबकि बाकी तीन में नए उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे हैं। इन तीन उम्मीदवारों से भी दो उम्मीदवार ऐसे हैं, जो कुछ माह पहले ही दूसरी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं।
हिसार से डॉ. कमल गुप्ता और नारनौंद से कैप्टन अभिमन्यु सीटिंग एमएलए हैं और उन्हें पार्टी ने फिर से टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है। तीसरे प्रत्याशी बरवाला से सुरेंद्र पूनिया हैं, जिन्होंने पिछला विधानसभा चुनाव भी लड़ा था और दूसरे नंबर पर रहे थे। इन तीन उम्मीदवारों के अलावा हांसी से विनोद भ्याणा और नलवा हलके से रणबीर सिंह गंगवा को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है। वर्ष 2014 में भ्याणा कांग्रेस से चुनाव लड़े थे। वे 13 दिसंबर 2018 को भाजपा में शामिल हो गए थे। इसी प्रकार रणबीर सिंह गंगवा इनेलो की टिकट पर नलवा सीट से विधायक थे और उन्होंने 21 मार्च 2019 को भाजपा ज्वाइन की थी। उकलाना से भाजपा ने आशा खेदड़ को चुनाव मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में इस सीट से भाजपा ने सीमा गैबीपुर को टिकट दी थी, जो इनेलो से भाजपा में आई थीं, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाई थी।
आदमपुर की सीट बची
भाजपा ने जिले की 6 सीटों पर तो प्रत्याशियों की घोषणा कर दी, लेकिन आदमपुर की सीट का सस्पेंस बाकी है। इस सीट से पिछले चुनाव में भाजपा ने कर्ण सिंह रानौलिया को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें हार झेलनी पड़ी थी। उन्हें मात्र 8319 वोट हासिल हुए थे और चौथे नंबर पर थे। यहां से कुलदीप बिश्नोई ने जीत दर्ज की थी। दूसरे नंबर पर इनेलो के कुलबीर सिंह बेनीवाल, जबकि तीसरे नंबर पर कांग्रेस के सतिंदर सिंह रहे थे। हालांकि भाजपा ने हार के बावजूद कर्णसिंह रानौलिया को माटी कला बोर्ड के चेयरमैन पद से नवाजा था, लेकिन इस बार उनकी टिकट कटती दिख रही है और किसी नए उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारे जाने की संभावना है।
कहीं बंटे लड्डू तो कहीं छाई मायूसी
भाजपा की लिस्ट का जितना इंतजार आम जनता को था, उससे कहीं अधिक भाजपा के ही उन नेताओं को भी था, जो टिकट की दौड़ में थे। लिस्ट जारी होते ही टिकट मिलने वाले नेताओं के घर और कार्यालयों में कहीं ढोल बजे तो कहीं लड्डू बंटे, लेकिन टिकट न मिलने वाले प्रत्याशियों के खेमे में मायूसी छा गई।