सिंधु घाटी सभ्यता-हड़प्पाकालीन संस्कृति के केंद्र राखीगढ़ी के गर्भ में दबे पुरावशेषों को दरियों पर भी देखा जा सकेगा। राखीगढ़ी की महिलाएं 6500 से 8000 साल पुरानी सभ्यता को अपनी कला के जरिए देश-विदेश तक पहुंचाने में जुटी हैं। तीन पीढ़ियों से दरी बनाने का काम करने वाले परिवारों से जुड़ीं महिलाएं दरियों पर ऊंट-घोड़े आदि के डिजाइन बनाती थीं पर अब राखीगढ़ी से जुड़ी कलाकृतियों को मूर्त रूप दे रही हैं। इस अनूठी हस्तशिल्प कला का लाइव डेमो सोमवार से शुरू हुए राखीगढ़ी महोत्सव में दिखाया जा रहा है।
राखीगढ़ी की खोदाई में मिले अवशेषों के डिजाइन इन महिलाओं को दिए गए हैं। इन्हें रंग-बिरंगे धागों से दरियों पर बुना जा रहा है। शीला, बीरमति, भतेरी और मुन्नी देवी ने बताया कि वे इस काम में मशीन का उपयोग नहीं कर रही हैं। बीरमति ने बताया कि उनकी दादी कच्चे सूत की कताई कर हाथ से दरी, खेस, रजाई आदि बनाती थीं। उन्हीं से यह कला सीखी है। किसी भी डिजाइन को देखकर उसे दरी पर धागों से बना सकती हैं।
पहले दरियों पर मकान, ऊंट, घोड़े, हाथी, लड़का-लड़की के चित्र बनाती थीं। अब राखीगढ़ी से जुड़े अवशेषों के डिजाइन बनाने का काम दिया गया है। भतेरी देवी ने बताया कि उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी तो नहीं है लेकिन इतना पता है कि बैल जैसे आकार बनाने हैं। राखीगढ़ी से जुड़े चित्र देकर उन्हें बनाने का प्रशिक्षण भी दिया गया। ये दरियां किस कीमत पर बिकेंगी इसकी जानकारी नहीं है।
छोटे आकार की दरी दो दिन और बड़े आकार की एक सप्ताह में तैयार हो जाती है। पूरा काम हाथ से बारीकी से करना होता है। इस कारण समय ज्यादा लगता है। दरी तैयार करने के लिए रंग-बिरंगा सूत खरीदकर लाती हैं। सूत की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होता है ताकि उसका रंग न निकले।
सीजेआई ने भी की थी सराहना
इसी साल जनवरी में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत हिसार दौरे के समय राखीगढ़ी संग्रहालय आए थे। उन्हें महिलाओं के हाथों से तैयार की गईं रंग-बिरंगी दरियां दिखाई गई थीं। सीजेआई ने महिलाओं के हुनर की तारीफ करते हुए उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया था।
राहुल बना रहे अवशेषों की प्रतिकृति
जींद जिले के गांव कालवा निवासी राहुल राखीगढ़ी की खोदाई में मिले अवशेषों की प्रतिकृतियां टेराकोटा में तैयार कर रहे हैं जिन्हें फ्रेम कर पर्यटकों के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। ये 100 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक में उपलब्ध हैं। राहुल ने बताया कि वह हेरिटेज वॉक में आने वाले पर्यटकों को मिट्टी से बर्तन-खिलौने बनाना भी सिखाते हैं। राहुल के हाथों से बनी कलाकृतियां जी-20 सम्मेलन में आए मेहमानों को भी भेंट की जा चुकी हैं। सीएम नायब सिंह सैनी इन कृतियों को कई बार देश-विदेश के प्रतिनिधियों को भेंट कर चुके हैं।
स्वयं सहायता समूह से जुड़ी बीरमति अपनी कुछ सहयोगियों के साथ राखीगढ़ी के चित्र दरियों पर बना रही हैं। यहां भ्रमण के लिए आने वाले पर्यटक स्मृति के तौर पर इन्हें खरीद कर ले जा सकते हैं। फिलहाल इन्हें ऑफलाइन ही बेचा जा रहा है। भविष्य में ऑनलाइन भी उपलब्ध कराएंगे ताकि राखीगढ़ी के इतिहास को देश-विदेश में हर कोने तक पहुंचाया जा सके। - वीरेंद्र श्योराण, जिला परियोजना समन्वयक, हिसार