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गुरु के गुरुर के कारण मारे गए छह निर्दोष, जिद्द कोर्ट में पेश नहीं होने की थी

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अमर उजाला ब्यूरो
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हिसार। जिन छह मासूमों की हत्या के मामले में रामपाल व उसके सहयोगियों को दोषी करार दिया गया है वह उसके गुरुर का नतीजा है। जो छह निर्दोष लोग इस हिंसा में मारे गए वह इसको भगवान मानकर यहां पर आए थे। बात सिर्फ इतनी सी थी कि रामपाल को हाईकोर्ट में पेश होना था। खुद को भगवान मानकर सल्तनत चला रहे रामपाल को यह मंजूर नहीं हुआ कि उसे कोई तलब करे और वह वहां पर जाकर सफाई दे।
जब वह हिसार कोर्ट में पेश हुआ तब भी उसने खुद की सुरक्षा के लिए पूरे कोर्ट परिसर को अपने निजी गुंडे भेजकर खाली करवा दिया। हाईकोर्ट से नोटिस आने के बाद भी उसने वहां जाने की बजाय न्यायतंत्र को भ्रष्ट बताते हुए अभियान शुरू कर दिया। इसके बाद जब कोर्ट से गिरफ्तारी के ऑर्डर आए तो उसने बीमारी का बहाना बनाया। इस पर कोर्ट ने उसे हर हाल में गिरफ्तार करके कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए। प्रशासन ने आश्रम में छिपे रामपाल को बाहर निकालने की तैयारी शुरू की तो रामपाल ने वहां पर आई महिलाओं व बच्चों को ढाल बना लिया। पूरे प्रकरण में अपने गुरु की जिद की वजह से छह मासूमों की जान चली गई।
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घटना में मारे गए परिजनों की तरफ से पुलिस को दी शिकायत में बताया कि हम पिछले काफी समय ये रामपाल के आश्रम में आ रहे थे। घटना से दो दिन पहले ही 11 नवंबर को उन्हें सत्संग की बात बोलकर यहां पर बुलाया गया था। जब वह यहां पर पहुंचे तो बोला गया कि गुरु जी की तबीयत खराब चल रही है, वह दो दिन बाद सत्संग करेंगे व सभी को दर्शन देंगे। तभी वहां पर पुलिस ने डेरा डाल दिया। हमें जबरदस्ती आश्रम में रोका गया व बाहर निकलने पर जान से मारने की धमकियां दी गईं। हजारों की भीड़ को एक जगह पर कैद कर दिया गया। वहां पर बंधक बनाए गए बुजुर्गों व बच्चों की हालत खराब होने लगी। कुछ लोग गंभीर रूप से बीमार थे, उसके बावजूद उन्हें बाहर नहीं जाने दिया गया। हालात खराब होने लगे और रामपाल के निजी सुरक्षा गार्डों ने पुलिस पर पथराव व पेट्रोल बम फेंकने शुरू कर दिए। रात के समय हुए हंगामे के कारण अंदर भगदड़ मच गई और सभी लोग अपने परिवारवालों से बिछड़ गए। उसके बाद उन्हें पुलिस ने आश्रम से बाहर निकाला। सुबह उन्हें पता चला कि उनके साथ आए कई लोग मारे जा चुके हैं।
बता दें कि कमला देवी नाम की एक महिला ने करौंथा गांव में रामपाल को आश्रम के लिए जमीन दे दी। 1999 में बंदी छोड़ ट्रस्ट की सहायता से रामपाल महाराज ने सतलोक आश्रम की नींव रखी।

रोहतक के करौंथा में हुआ था विवाद
2006 में स्वामी दयानंद की लिखी एक किताब पर संत रामपाल ने एक टिप्पणी की। आर्य समाज इस टिप्पणी से नाराज हो गया। आर्य समाज और रामपाल समर्थकों में हिंसक झड़प हुई। इसके बाद हालात तनावपूर्ण हो गए। 12 जुलाई, 2006 को रामपाल के अनुयायियों और आर्य समाजियों में खूनी टकराव हो गया। इसमें एक महिला की मौत हो गई थी। इसके बाद पुलिस ने आश्रम को कब्जे में ले लिया। इस मामले में रामपाल और उनके कई समर्थकों के खिलाफ केस दर्ज करने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। 9 महीने जेल में सजा काटने के बाद रामपाल को 30 अप्रैल 2007 को रिहा कर दिया गया था। करौंथा में लगातार हो रहे हंगामे के बाद रामपाल ने अपना आश्रम हिसार के बरवाला में शुरू कर दिया था।

दोबारा फिर हुआ विवाद
2009 में संत रामपाल को आश्रम वापस मिल गया। आर्य समाज के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। 12 मई 2013 को नाराज आर्य समाजियों और संत रामपाल के समर्थकों में एक बार फिर झड़प हुई। इसमें भी दो लोग मारे गए व कई लोग घायल हो गए। विवाद को देखते हुए इस केस को हिसार कोर्ट में भेजा गया था। इसी मामले को लेकर हिसार कोर्ट में हंगामा हुआ था।
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वकीलों को कोर्ट परिसर में जाने से रोकने पर हुआ था हंगामा
करौंथा मामले को लेकर हिसार कोर्ट में 13 जुलाई 2014 को हिसार कोर्ट में सुनवाई होनी थी। सुनवाई से पहले रामपाल के निजी सुरक्षाकर्मियों ने पूरे कोर्ट परिसर को घेर लिया व किसी भी वकील को कोर्ट में नहीं जाने दिया। इसी बात को लेकर वहां पर विवाद हो गया और हिसार बार इसके खिलाफ हाईकोर्ट चली गई। हाईकोर्ट ने इस मामले में रामपाल को नोटिस जारी करते हुए पेश होने का आदेश दिया, लेकिन रामपाल पेश नही हुआ। 5 नवंबर को पंजाब-हरियाणा कोर्ट ने रामपाल के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था। 10 नवंबर को रामपाल को कोर्ट में पेश होना था, लेकिन संत के समर्थकों ने रामपाल को अस्वस्थ बताकर, गिरफ्तारी का आदेश मानने से ही इनकार कर दिया और संत रामपाल कोर्ट में पेश नहीं हुए। इसी को लेकर 14 नवंबर को बरवाला में सतलोक आश्रम के बाहर प्रशासन ने डेरा डाला था। छह दिन के हंगामे के बाद पुलिस ने 19 नवंबर को रामपाल को गिरफ्तार किया था।
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