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अब हरियाणा के तीसरे लाल की पार्टी हुई दोफाड़

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हिसार। हरियाणा में राजनीतिक पृष्ठभूमि में तीन लालों बंसीलाल, देवीलाल, भजनलाल का वर्चस्व रहा है। समय-समय पर इन लालों को जहां राजनीतिक सत्ता का सुख भोगने को मिला, वहीं तीनों ने ही राजनीतिक दुश्वारियां भी झेली हैं। बंसीलाल व भजनलाल का अधिकांश राजनीतिक सफर कांग्रेस पार्टी से जुड़ा रहा। अपने राजनीतिक सफर के अंतिम पड़ाव पर इन दोनों नेताओं ने कांग्रेस पार्टी से विमुख होना पड़ा और अपनी अलग पार्टी का गठन भी किया, लेकिन दोनों नेताओं की राजनीतिक पार्टियों का जीवनकाल मात्र आठ साल और नौ साल ही रहा। इसके विपरीत देवीलाल की विरासत (इंडियन नेशनल लोकदल) इनेलो अपनी स्थापना के 31 साल के बाद दोफाड़ हो गई है।
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हविपा का आठ साल का जीवनकाल
स्व. बंसीलाल ने 1996 में कांग्रेस से अलग होने के बाद हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) की स्थापना की। उसी वर्ष होने वाले चुनाव में बंसीलाल ने शराबबंदी का नारा दिया और उनके इस अभियान ने उन्हें उसी वर्ष विधानसभा चुनाव में सत्ता में स्थापित भी कर दिया, हालांकि यह सत्ता भाजपा के सहयोग से मिली। वर्ष 1999 में हविपा-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद सरकार भी गिर गई। फिर पांच साल संघर्ष किया और आखिरकार 10 अक्तूबर 2004 को बंसीलाल ने अपनी पार्टी हविपा का कांग्रेस में विलय करने की घोषणा, जो औपचारिकता के बाद 14 अक्तूबर को विधिवत रूप से कांग्रेस में समा गई।

हजकां का नौ साल रहा वजूद
हरियाणा के दूसरे लाल भजनलाल ने वर्ष 2007 में हरियाणा विकास पार्टी (हविपा) का गठन किया था। कांग्रेस पार्टी की ओर से वर्ष 2005 में भूपेंद्र हुड्डा को प्राथमिकता दिए जाने से नाराज होकर भजनलाल ने पार्टी बनाई थी। वर्ष 2011 में तीन जून को भजनलाल का देहांत हो गया, जिसके बाद पार्टी की कमान उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने संभाल ली थी। आखिरकार नौ वर्ष संघर्ष करने के बाद कुलदीप ने 27 अप्रैल 2016 को अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर लिया।
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अब देवीलाल के पोतों का राजनीतिक सफर अलग-अलग
इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) का गठन 1987 में किया गया था। उस समय देेवीलाल की तूती बोलती थी। उनकी विरासत को ओमप्रकाश चौटाला ने बखूबी संभाला, लेकिन जेबीटी भर्ती घोटाले में उनके और अजय चौटाला के जेल जाने के बाद पार्टी की कमान अभय सिंह चौटाला के हाथ में आ गई। वर्ष 2006 के बाद प्रदेश में 2009 और 2014 में दो बार हुए विधानसभा चुनावों से इनेलो सत्ता से बाहर थी। इसका अस्तित्व खतरे में था, लेकिन पिछले दो साल से पार्टी फिर से खड़ी दिखाई देने लगी थी, लेकिन स्व. देेवीलाल के पोतों के बीच घरेलू विवाद ने पार्टी को दोफाड़ के अंजाम तक पहुंचा दिया। 31 साल के राजनीतिक सफर के बाद पार्टी शनिवार को दो हिस्सों में बंट गई।

सबसे पिछड़ा जिला है राजनीतिक राजधानी जींद
जींद जिला हरियाणा प्रदेश की राजनीतिक राजधानी के रूप में जाना जाता है। जब भी किसी नेता को बड़ा राजनीतिक ओहदा चाहिए होता था, वह सबसे पहले जींद में रैली का आयोजन करता था। जींद जिला स्व. देवीलाल, स्व. भजनलाल और स्व. बंसीलाल से लेकर ओमप्रकाश चौटाला, भूपेंद्र सिंह हुड्डा तक की रैलियों का गवाह रहा है। इसी साल फरवरी में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी जींद में रैली की थी। जिस प्रकार जींद जिला राजनीतिक आकांक्षाओं का प्लेटफार्म हमेशा रहा है, उसी तरह यह राजनीतिक आकाओं की अनदेखी का शिकार भी रहा है, जिस कारण विकास के मामले में यह प्रदेश में सबसे ज्यादा पिछड़े जिलों की श्रेणी में शुमार है।
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