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महंगी किताबों में मोटे कमीशन का बड़ा खेल--

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अमर उजाला ब्यूरो
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हिसार।
एनसीईआरटी की जगह प्राइवेट पब्लिशर की महंगी किताबें यूं ही नहीं बेची जाती। महंगी किताबों की बिक्री में मोटा कमीशन का ‘खेल’ छिपा है। बुक डिपो संचालकों से लेकर लोकल एजेंट और स्कूल प्रबंधन तक को कमीशन जाता है। दाखिला प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही कुकुरमुत्तों की तरह पब्लिकेशन हाउस के एजेंट स्कूलों में पहुंचने लगते हैं। लोकल एजेंट की अधिक मदद ली जाती है। इसके बाद तय होता है कमीशन और किताबों के रेट का बड़ा ‘खेल’।
20 से 40 प्रतिशत तक होता है कमीशन
एक बार स्कूल प्रबंधन के साथ मामला फिक्स करने के लिए प्राइवेट पब्लिशर 20 से 40 प्रतिशत तक कमीशन भी देते हैं। किताबों से लेकर नाम लिखी कापियां, पैन तक देने पर सहमति बना ली जाती है। इसके बाद स्कूल प्रबंधन का काम अभिभावकों को किताबों की लिस्ट बनाकर देना होता है। इसके लिए एक ही दुकान चिह्नित करके उसका पता बता दिया जाता है।
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आखिर चुनिंदा दुकान पर ही किताबें क्यों
इस गोरखधंधे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर चुनिंदा दुकान पर ही किताब क्यों मिलती है। स्कूल प्रबंधन द्वारा दी गई किताबों की लिस्ट किसी भी दुकान पर क्यों नहीं मिलती है। बताया जाता है कि प्राइवेट पब्लिशर स्कूल प्रबंधन के साथ सांठगांठ कर ऐसी किताबों को ही सिलेबस में शामिल करवाते हैं, जिनको वे खुद ही उपलब्ध करवा सके।
लगातार संपर्क में रहते हैं एजेंट
नाम न छापने की शर्त पर एक दुकान संचालक बताते हैं कि किसी भी स्कूल की स्टेशनरी से संबंधित डील के लिए स्कूल प्रबंधन या प्रिंसिपल के पास पहुंचते हैं। किताबों और कापियों के अलावा अन्य सामान के रेट को लेकर मोल-भाव कर लिया जाता है। उसके बाद कमीशन तय होता है। कुछ हिस्सा प्रिंसिपल को भी देना पड़ता है। इसके लिए लगातार संपर्क में रहना पड़ता है।
20 पेज की किताब के भी लेते हैं 300 रुपये
प्राइवेट पब्लिशर की कई किताबें ऐसी होती हैं, जिनमें पेजों की संख्या 15 से 20 ही होती है, लेकिन इनकी कीमत 300 रुपये तक या इससे भी अधिक होती है। मजबूरी में अभिभावकों को खरीदनी पड़ती है।
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अधिक ब्रांच वाले स्कूलों पर रहता है विशेष फोकस
प्राइवेट पब्लिशर का विशेष फोकस ऐसे स्कूलों पर रहता है, जिनकी जिले में कई ब्रांच चलती हो। ऐसा इसलिए किया जाता है, क्योंकि सभी ब्रांचों में फिर एक जैसा ही सिलेबस तय कर दिया जाता है, जिससे सभी ब्रांचों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एक ही पब्लिकेशन की किताबें बेची जा सके।
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